सर्कस

हम सब मिल सर्कस को आये

एक उमंग मन मे भर लाये

हाथी दादा कब तक आएंगे

बच्चों का दिल बहलाएंगे

भालू है हम सब का प्यारा

खेल दिखाते बन्दर न्यारा

मोटर का भी करतब होगा

ये तो मेला खूब सजेगा

शुरू हुआ सर्कस का खेला

लगने लगा जीवन का मेला

करतब पे करतब आते थे

आंखों को चौंका जाते थे

बैठे रहे तालियां पीटीं

खडे हो गये मारी सीटी

थोडी देर में मन भर पाया

सब कुछ लगा मिथ्या माया

जी में आया अब उठ जायें

घर को जाएं  छुट्टी पाएं

जीवन भी तो ऐसा ही है

एक सर्कस के जैसा ही है

जानवर बन जाता इंसान

खेले खेल समय बलवान

वही है सर्कस वही है मेला

बदला तो बस चेहरा  चोला

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2 comments on “सर्कस

  1. Avanish says:

    Life is truly a circus and if at all we could view it as the spectators, we would first enjoy it, get over it and then leave it with grace and contentment. It was an enjoyable evening anyway that day and good that it provided you something to pen down!

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