दोस्ती की वजह कोई नहीं

ज़ुबां खामोशी की

तस्सवुर तुम्हारा                                                

बातें झरना मीठे पानी का

और खयाल फिसलती रेत से

कुछ ज़ाहिर, कुछ ज़ेहेन में बसे

एक रूहानी शाम , तुम्हारा साथ

वक़्त के दरियाओं के पार

कांधा तुम्हारा , दुख सुख हमारे

अश्क़ रुके हैं

पलकों के तले, अनबहे

उलझी हुई उंगलियां

हाथों में हाथ

दोस्ती की कोई वजह नहीं

ये तो है  जन्मों का साथ……..

~ ये कविता मेरे प्रिय मित्र श्री रवि शरन जी ने मेरे ब्लाग के लिये रची है. मैं इस भेंट के लिये उनका बहुत आभारी हूं .

The Crystal Ship – Jim Morrison

Check out the classical Version………Its just awesome !!!

Before you slip into unconsciousness
Id like to have another kiss
Another flashing chance at bliss
Another kiss, another kiss

The days are bright and filled with pain
Enclose me in your gentle rain
The time you ran was too insane
We’ll meet again, we’ll meet again

Oh tell me where your freedom lies
The streets are fields that never die
Deliver me from reasons why
Youd rather cry, Id rather fly

The crystal ship is being filled
A thousand girls, a thousand thrills
A million ways to spend your time
When we get back, Ill drop a line

Will surely drop you a line before I reach there , my friend.

एक और शाम

We come spinning out of nothingness, scattering stars like dust ~ Rumi

एक और शाम

खालीपन , मैं और जाम

कल से फिर ज़िन्दगी वही

घर, दफ्तर …. काम

पैसा , रुपया, रिश्तेदारी

जीना भी एक ज़िम्मेदारी

कैसी मोहब्बत कौन सा प्यार

खुद को है लम्हा दुशवार

रोज़ रात को तुम आते हो

सपना बन कर छा जाते हो

तुमको छू लूं ओ मेरे तारे

तुम लगते हो सच , और प्यारे

~ By Aahang

बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किये हुए…..

मुद्दत हुई है यार को महमाँ किये हुए
जोश-ए-क़दह से बज़्म चराग़ाँ किये हुए

Its been long since I hosted my love

When the warmth of wine had lit the candles

करता हूँ जमा फिर जिगर-ए-लख़्त-लख़्त को

अर्सा हुआ है दावत-ए-मिज़्श्गाँ किये हुए

I gather pieces of my body once more

Its been an age since those eyes had killed me

फिर वज़ा-ए-एहतियात से रुकने लगा है दम
बरसों हुए हैं चाक गिरेबाँ किये हुए

The decorum of restraint is suffocating

I wish I could tear my clothes in agony like before

फिर पुर्सिश-ए-जराहत-ए-दिल को चला है इश्क़

सामाँ-ए-सदहज़ार नमकदाँ किये हुए

Love comes to inquire on the well being of the heart

But carries with it a handful of salt to sprinkle on the wounds

दिल फिर तवाफ़-ए-कू-ए-मलामत को जाये है

पिंदार का सनमकदा वीराँ किये हुए

The heart wants to visit the abode of my beloved

leaving vacant  the house of pride I had built

फिर शौक़ कर रहा है ख़रीदार की तलब
अर्ज़-ए-मता-ए-अक़्ल-ओ-दिल-ओ-जाँ किये हुए

My desire demands a purchaser once again

For my intellect my  mind and my spirit

फिर चाहता हूँ नामा-ए-दिलदार खोलना

जाँ नज़र-ए-दिलफ़रेबी-ए-उन्वाँ किये हुए

I yearn to open the letter from my love

agreeing to sacrifice my heart on the seduction of what’s said

माँगे है फिर किसी को लब-ए-बाम पर हवस
ज़ुल्फ़-ए-सियाह रुख़ पे परेशाँ किये हुए

My passion longs to see upon my door

That face with dark dishevelled hair

इक नौबहार-ए-नाज़ को ताके है फिर निगाह

चेहर फ़ुरोग़-ए-मै से गुलिस्ताँ किये हुए

My eyes look eagerly at the beauty of youth in first blossom

a face flushed with the redness of wine, with all the colors of a garden

फिर जी में है कि दर पे किसी के पड़े रहें
सर ज़ेर बार-ए-मिन्नत-ए-दर्बाँ किये हुए

Again I wish to lie on the my lover’s doorstep

my head crushed by pleading to the guards

जी ढूँढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किये हुए

my mind seeks those lazy times again

when I could sit for long, thinking about my beloved

“ग़ालिब” हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से
बैठे हैं हम तहय्या-ए-तूफ़ाँ किये हुए

Ghalib, Do not bother me, for with a storm of tears in my eyes

I am sitting here , with a mind made up, to unleash a hurricane at will

~ interpretative translation by aahang