Being straight and not straightened

Here is something I found on You tube.

I do not subscribe to the views expressed in the video and this is being put up by me just for the sake of reference as many others I have interacted with have similar notions.

Personally,whenever I have tried to explore Islam , I have found it to be a very repressive philosophy -arcane in its expression and orthodox in its approach.Going through the verses of Quran , it feels like you are going through a manual of Do’s and Dont’s  which tells you how to act in times of strife.It seems quite opposed to my idea of a religion.

Even though what Churchill says is not free from his own prejudices , his point about Islam being more of a cult rather than a religion as it does not allow self exploration and inquiry strikes a chord in an interesting way. Hinduism and Budhhism both give a lot of emphasis on looking inward and challenging yourself to find the truth in you.Islam on the other hand offers a philosophy in which others and their view of you seems to be central to your existence.I am really aghast sometimes the way women and their freedom is dealt with.Are they not children of the same God??

As a Hindu religion is personal to me and I find it hard to subscribe to a point of view which forces discipline on others around you while discouraging knowledge of your own self.

I believe in Being straight and not straightened as Marcus Aurelius has said.

I am reading more to understand one thing – if a billion people believe in Islam so ardently ,there has to be more to it than what I know. Coming from a very tolerant Hindu background I find the ways of Islam quite bitter and aggressive but then I find myself being drawn to Sufism time and again.

A word of Caution on Churchill’s speech: We must remember that it’s the same Churchill who uttered all kinds of statements about India and Hindus , Brahmins in particular.Here’s what noted Historian Ramachandra Guha writes in the Hindu :

http://www.hinduonnet.com/thehindu/mag/2005/06/05/stories/2005060500170300.htm

And being a drunkard and a womanizer himself it is understandable that he found the tenets of Islam particularly annoying.

Anyway being honest to the spirit of inquiry is what will finally  remove all doubts – for or against and that’s exactly what my pursuit is going to be.

मै खयाल हूं किसी और का..

मै खयाल हूं किसी और का मुझे सोचता कोई और है

मेरा अक्स है सरे आइना पसे आइना कोई और है …

अक्स – image पसे आइना- behind the mirror

मैं किसी के दश्त ए तलब में हूं मैं किसी कि हर्फ ए दुआ में हूं

मैं नसीब हूं किसी और का मुझे मांगता कोई और है …..

दश्त ए तलब – As ordered by hand हर्फ ए दुआ – words of prayer

मुझे दुश्मनों कि खबर ना थी तुझे दोस्तों का पता न था

मेरी दास्तां कुछ और थी तेरा वाकया कोई और है ..

वाकया – anecdote दास्तां – story

कभी लौट आयें तो पूछ्ना नहीं देखना उन्हें  गौर से

जिन्हें रास्ते में खबर हुई कि ये रास्ता कोई और है….

Just ask them casually , don’t offer a surprised look

Perhaps they realized mid way,that this is not the right direction

अजब ऐतबार औ बे ऐतबारी के दरमियां है ये ज़िन्दगी

मैं करीब हूं किसी और के मुझे जानता कोई और है  ….

ऐतबार औ बे ऐतबारी के दरमियां – between trust and  doubt

~ Salim Kausar

http://www.youtube.com/watch?v=6SKb0gOR8SU&feature=related

Aaj Phir Mauj dar Mauj

Kalam e Faiz beautifully composed by Muzaffar Ali( umrao Jaan) and sung magically by none other than Sukhwinder ( mera jee karda @mons0on wedding)

Urdu is tough but thankfully the Video comes with an English Translation.

Watch out for the Lyrical genius of Faiz, The melody and laya  of the composition and the harkat in Sukhwinder’s rendition.

A masterpiece truly..

कठहल और काजू

ज़िन्दगी का सफर

नया शहर नया घर

घर में है एक बालकनी

पेडों की जिसमे छांव घनी

मस्त हवा ऐसे बहती है

जैसे मुझ से ये कहती है

दो पेड हैं देखो राजू

एक है कटहल दूसरा काजू

काजू तो बस थोडे से हैं

कटहल साले भरे पडे हैं

अलग अलग है इनकी जात

दोनो पर रेह्ते हैं साथ

दोनों का कोई मेल कहां है

कुदरत का ये खेल नया है

उसके मन की वो  ही जाने

हम तो बस जीवन पहचानें

~  आहंग

मधुशाला के कुछ ठिकाने

छोटे से जीवन  में कितना                                                        

प्यार करूं , पी लूं हाला ,

आने के ही साथ जगत  में

कहलाया  “जानेवाला”

स्वागत के ही साथ विदा की

होती देखी तैयारी,

बंद लगी होने खुलते ही

मेरी जीवन मधुशाला ….

कितनी जल्दी रंग  बदलती

है अपना चंचल  हाला ,

कितनी जल्दी घिसने लगता

हाथों मे आकर प्याला ,

कितनी जल्दी साकी का

आकर्षण घटने लगता है ;

प्रात नहीं  थी वैसी, जैसी

रात लगी थी मधुशाला  ……

नही चाहता ,आगे बढ्कर

छीनूं  औरों का प्याला,

नहीं चाहता , ध्क्के  देकर

छीनूं औरों की   हाला ,

साकी ,मेरी ओर  न देखो ,

मुझको  तनिक मलाल  नहीं ;

इतना ही क्या कम आखों  से

देख रहा हूं   मधुशाला ……

उस प्याले  से प्यार  मुझे जो,

दूर  हथेली से प्याला ,

उस  हाला  का चाव मुझे  जो

दूर  अधर मुख  से  हाला  ;

प्यार  नहीं पा जाने में है  ,

पाने के अरमानों  में ,

पा जाता  तो  हाय  ना इतनी,

प्यारी लगती  मधुशाला  …..

प्राप्य  नहीं है तो, हो जाती

लुप्त  नहीं  फिर  क्यूं  हाला ,

प्राप्य नही  है  तो, हो जाता

लुप्त  नहीं  फिर  क्यूं  प्याला ;

दूर ना इतनी हिम्मत  हारूं  ,

पास ना इतनी  पा जाऊं,

व्यर्थ मुझे दौडाती  मरू में  ,

म्रुगजल  बन कर मधुशाला  ……

– हरिवंशराय ” बच्चन “

ईश्वर विश्वास

एक मनुश्य का ग्यान सीमित होता है , शक्ति  सीमित होती है और सद्भाव   सीमित होता है. परंतु इसी ज्ञान ,शक्ति   एवं सद्भाव की जो समष्टि  होती है वो अपरिमित  होती है. ईश्वर सब कुछ  जानता है -सर्वग्य है ;सब  कुछ करा सकता  है – सर्वश्क्ती मान  है ;सबका हित  करता है -द्यालु  है .ईश्वर  की सर्वग्यता  का अर्थ है कि वो हमारे ह्रुद्य  की जानता है ; सर्वशक्तिमानता का अर्थ  है  कि  वो सब कुछ कर सकता है ;दयालुता  का अर्थ  है  कि वो  दुख, मूर्खता और  म्रत्यु  के भय से हमको मुक्त  कर दे. ईश्वर यही करता है. इसलिये ईश्वर पर विश्वास रखना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है .