मधुशाला के कुछ ठिकाने

छोटे से जीवन  में कितना                                                        

प्यार करूं , पी लूं हाला ,

आने के ही साथ जगत  में

कहलाया  “जानेवाला”

स्वागत के ही साथ विदा की

होती देखी तैयारी,

बंद लगी होने खुलते ही

मेरी जीवन मधुशाला ….

कितनी जल्दी रंग  बदलती

है अपना चंचल  हाला ,

कितनी जल्दी घिसने लगता

हाथों मे आकर प्याला ,

कितनी जल्दी साकी का

आकर्षण घटने लगता है ;

प्रात नहीं  थी वैसी, जैसी

रात लगी थी मधुशाला  ……

नही चाहता ,आगे बढ्कर

छीनूं  औरों का प्याला,

नहीं चाहता , ध्क्के  देकर

छीनूं औरों की   हाला ,

साकी ,मेरी ओर  न देखो ,

मुझको  तनिक मलाल  नहीं ;

इतना ही क्या कम आखों  से

देख रहा हूं   मधुशाला ……

उस प्याले  से प्यार  मुझे जो,

दूर  हथेली से प्याला ,

उस  हाला  का चाव मुझे  जो

दूर  अधर मुख  से  हाला  ;

प्यार  नहीं पा जाने में है  ,

पाने के अरमानों  में ,

पा जाता  तो  हाय  ना इतनी,

प्यारी लगती  मधुशाला  …..

प्राप्य  नहीं है तो, हो जाती

लुप्त  नहीं  फिर  क्यूं  हाला ,

प्राप्य नही  है  तो, हो जाता

लुप्त  नहीं  फिर  क्यूं  प्याला ;

दूर ना इतनी हिम्मत  हारूं  ,

पास ना इतनी  पा जाऊं,

व्यर्थ मुझे दौडाती  मरू में  ,

म्रुगजल  बन कर मधुशाला  ……

– हरिवंशराय ” बच्चन “

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One comment on “मधुशाला के कुछ ठिकाने

  1. I love this poem. Thanks for publishing

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