ईश्वर सबका शरीरी है

एक मनुश्य के शरीर मे इतने कीटाणु होते हैं जितने सारी स्रुष्टी में मनुष्य नहीं हैं .उनमें अलग अलग चेतना होती है ,अलग अलग स्वभाव होते हैं, दल बंदी होती है.कोईरोग देते हैं कोई अरोग्य.परंतु उन सबको एक मनुश्य ,अपना ‘मैं’ मानता है.  शरीर ही मै है तो  उसके कीटाणु  मै हो ही गये. इन सबको  “मैं’ कहने  वाला जैसे  शरीर में  जीव होता है  ,उसी प्रकार सम्पूर्ण  विश्व में जितने  भी  प्राणी है , जीव जंतु  हैं – अलग अलग  स्वभाव  अलग अलग गुण धर्म ,अलग अलग जाते , अलगअलग व्यक्ति ,उनका परस्पर  राग द्वेश , दलबंदी – सब का सब एक ईश्वर के शरीर में  है. वही  स्रुष्टी कर्ता है, वही सबका भरण पोषण करने वाला भर्ता है और  वही  संहार  कर्ता है. जैसे हम  अपने शरीर को ‘मैं’ मानते है ,वैसे ही  वह सम्पूर्ण विश्व को मै  के रूप  में जानता है. जैसे हम  कुछ खा पी कर कीटाणुओं  की कुछ्  जाति को बढाते  हैं ,कुछ को घटाते हैं ,वैसे  ही  ईश्वर भी खेल करता रेह्ता है. ईश्वर विचारवान के  लिये  स्पष्ट रूप  से विश्व  का संचालक  है,अंतर्यामी है और स्वामी  है .उसी के   आश्रय में प्राणी मात्र का निवास है,वही सबको धारण करता है.जो ऐसे ईश्वर को नहीं मानते जानते हैं वे  अज्ञानी हैं ;उनकी बात पर कभी ध्यान  नही  देना चाहिये .ईश्वर आश्रय में ही जीव का परम कल्याण है.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s