हर घडी खुद से उलझना ….

हर घडी खुद से उलझना है मुक्कद्दर मेरा

मैं हूं कश्ती मुझी में है समंदर मेरा…

एक से हो गये मौसम हों कि चेहरे सारे

मेरी आंखों से कहीं खो गया मंज़र मेरा..

किससे पूछूं कि कहां गुम हूं कई बरसों से

हर जगह  ढूंढता फिरता है मुझे घर मेरा…

निदा फाज़ली

कौन सी बात कहां कैसे कही जाती है, ये सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है…..
हमारा अज़्मे सफर कब किधर का हो जाये, ये वो नहीं जो किसी रह्गुज़र का हो जाये

उसी को हक़ है जीने का इस ज़माने में, जो इधर का लगता रहे और उधर का हो जाये….

शर्तें लगायी जाती नहीं दोस्ती के साथ,कीजिये मुझे कबूल मेरी हर कमी के साथ

किस काम की रही ये दिखावे की ज़िंदगी वादे किये किसी से गुज़ारी किसी के साथ..

– वसीम बरेलवी

मुनव्वर मां के आगे कभी खुल कर नही रोना , जहां बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती

मैंनें कल शब चाहतों की सब किताबें फाड दी , सिर्फ एक कागज़ पे लिखा लफ्ज़ मां रहने दिया

मेरी ख्वाहिश है कि मैं फिर से फरिश्ता हो जाऊं,मां से इस तरह लिपटूं कि बच्चा हो जाऊं

कम से कम बच्चों के होठों की खातिर ,ऐसी मिट्टी  में मिलाना के  खिलौना हो जाऊं  …

सूरज नें तमक कर कहा था के शब्बा खैर , मुमकिन नहीं था ऐसे में जुगनूं ना बोलता ..

– मुन्नवर राना

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