The slow arrow of beauty….

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर ए नीमकश को

ये खलिश कहां से होती जो जिगर के पार होता ….

My heart alone could tell about your half-drawn arrow,
Could it leave a sting behind, had it pierced the marrow?

The slow arrow of beauty as Nietzsche calls it has a distinctive quality.It does not jolt us suddenly with its power but slowly seeps into us when we least expect.It then starts to grow upon us consuming all our senses unless it stands at the gates of our intellect questioning our ideas about right and wrong.It is neither violent nor intoxicating but is rather graceful and well thought about.It first starts inundating our dreams with visions of love, passion and seduction but then it quickly takes control of our awakened even enlightened mind. And this does not happen at a physical level.No absolutely not. There is more fire,wind and sky in it than is water and earth.The fire burns and it evaporates all the fluidity of our thoughts.The wind and sky control the water and earth to create a form of their own choosing. Its a complete takeover no more friends, no more family, no more money, no more power,no more good, no more evil.It is a supreme idea which is all consuming.The mind sways , utters a command and the body just follows it – as if in a trance , in a state of complete surrender.

The slow arrow of beauty doesn’t just strike and pass through our heart.No, it grows in size as it pierces deeper and gathers momentum.Deeper and Deeper , farther and farther it keeps going as if there is no end.A then strange thing happens – our heart starts growing with the arrow.The deeper it goes the larger the expanse of our heart till it realizes that the whole universe is but a part of it.The blood that flows from the heart so pierced spreads upon all we touch and see and leaves its mark upon all we know or do.The longing,the separation is unbearable but something whispers from within that this is a perfect state.This is how you want it to be forever like the Ying and Yang.You feel the opposite force but you are completely at peace with it. Jigar says :

एक लफ्ज़ ए मोहब्बत का अदना ये फसाना है, सिमटे तो दिले आशिक़ फैले तो ज़माना है..

Distance is now the only reality.Separation is that what creates and fills in the vacuum of nothingness.You know that there is no such thing as beauty and the idea of happiness from beauty is a mirage, a myth, a misconception of a confused mind.The fact is that you love your desire more than what is desired.As soon as the beauty which till now was far away,out of bounds, even forbidden becomes close,available, attainable it loses its charm and you will stop loving it.We are now kind of used to its charm , now as stale as the day gone by.

Will leave you with these powerful lines from Dr Bachchan ;

कितनी जल्दी रंग  बदलती

है अपना चंचल  हाला ,

कितनी जल्दी घिसने लगता

हाथों मे आकर प्याला ,

कितनी जल्दी साकी का

आकर्षण घटने लगता है ;

प्रात नहीं  थी वैसी, जैसी

रात लगी थी मधुशाला  ……

नवाबी तलवार…

एक मर्तबा लखनऊ शहर में एक उजडे नवाब हुआ करते थे. नाम था मिराजुद्दौला. उनकी तारीफ यूं तो क्या  थी सिवा इसके कि बाप दादों की रियासत का मज़ा लूटते थे पर हां  यही बात अगर आप हमसे उनके सामने पूछ्ते तो हमारा जवाब ज़हिर तौर पर ये होता  कि साहब जितनी की जाये कम है !

अब नवाब कह दिया तो ये तो साफ ही हो गया कि कोई काम काज तो मियां मिराजुद्दौला क्या ही करते होंगे पर हां इसका ये मतलब कतई नही निकलता उनकी मसरूफियत में कोई कमी थी. नसीमो सुबह से गुफ्तगू करने और गुसल फरमाने के बाद नवाब साहब  बाकयदा दीवानखाने में तख्तनशीं हो जाया करते और शाम होने तलक कौम के तमाम इखलाकी और तम्यद्दुन्नी मसलों में दखल दिया करते. चूंकि उनकी नसीहतें ज़रा ओछी और कमतर हुआ करती थी सो  वो  आलिम फाज़िल कम किस्सा  गो  के तौर पर  ज़्यादा मशहूर हो गये थे.खैर बद्नाम हुए तो  क्या नाम ना हुआ…..

अरे हां उनकी मकबूलियत कि एक वजह ये भी थी उनके बावर्ची जैसे लज़ीज़ कबाब और पराठे सारे लखनऊ शहर में और कोई नहीं बनाता  था.एक बार तो हमारे पर दादा जान की किस्मत का तारा भी चमका था ,क्या बतायें आज तलक हमारे खानदान में सबकी उंगलियां पतली हुआ करती हैं.

हुज़ूर यूं तो नवाब मिराजुद्दौला की करामातों के तमाम  किस्से आप चौक की गलियों में गोलियां खेलते लौंडों से सुन सकते है पर जो किस्सा हम आज आपको  सुनायेंगे वो सबसे अलग और अहम है.लीजिये संभालियेगा…

तो जनाब हुआ यूं  कि  एक रोज़  नवाब साहब ज़रा हवा  खाने  को निकले तो उनकी  सवारी  का रुख    नख्खास  की  तरफ  हो गया. लखनऊ शहर में नख्खास जो था वो पुरानी और नायाब चीज़ों के लिये  मशहूर हुआ करता था. दबी ज़बान में तो लोग ये भी  केहते थे कि वहां बहुत सा मालो असबाब वो होता है जिसके मालिक का कोई अता पता न हो. आप चाहें तो इसे चोर बज़ार कह सकते हैं पर हम नहीं कहेंगे. अब जिस जगह पर नवाब साहब की आमोदरफ्त  हो उसे हम कैसे कह दें कि वो चोर बज़ार है.आखिर शराफत भी कोई चीज़  है.बहरहाल घूमते घामते नवाब साहब की नज़र एक ऐसी चीज़ पर पडी जिसका इस्तेमाल उनके बाप दादों ने भी नहीं किया था पर हां वो चीज़ ऐसी थी कि उनके रुतबे और मिजाज़ केमुताबिक थी. जी हां वो थी एक तलवार. आप सोचते होंगे कि कौन सी बडी बात है ,पर थी बडी बात और नहीं थी तो बनाई जा सकती थी.

सौदा हुआ और आनन फानन में तलवार नवाब की कोठी में आ गयी और दीवानखाने की दीवार पर सजा दी गई. कहा गया कि ये बडी नायाब और बेशकीमती तलवार है जो नवाब साहब को  अपने पुर्खों से मिली है. अब तलवार लोहे की और नौकर नवाब के कौन केहता कि नहीं ऐसा नहीं है या ये सरासर झूट है.नवाब साहब के वफादार नौकर चाकर एकदम इस खबर को मशहूर करने में लग गये कि कोठी में एक ऐसी नायाब चीज़ है कि जिसके देखे बगैर अगर अल्ला मियां को प्यारे हो गये तो समझो गये दोनों जहान से. लिहाज़ा लखनऊ की गलियों में एक वलवला सा उठ्ठा और तमाम लोग कोठी की ओर रोज़  कूच  करने  लगे. तलवार जितना देखने की नहीं उतना सुनने की चीज़ थी और वो इसलिये कि नवाब साहब खुद उसके जलवों की  दास्तान आने वालों को पेश किया करते थे. देखते ही देखते तलवार लखनऊ की  शान  बन गयी. ये वो तलवार थी जिसमे बेश्कीमती हीरे और जवहेरात लगे हुए थे, ये वो तलवार थी जिससे नवाब साहब के मरहूम दादा जान ने कम से कम सैकडों दुशमनों को  मौत से जलवागर करवा दिया था,ये वो तलवार थी जिसे मलिका ए इंग्लिस्तान किसी कीमत पर हथियाना चाहेती थीं, ये वो  तलवार थी जिसने ना जाने कितनी बार लखनऊ की इज़्ज़त और अस्मत को लुटने से  बचाया था, ये वो तलवार थी जिसे आखों से लगा कर होठों से चूमना  हर शहरी और सच्चे वतन परस्त का फर्ज़ था. ये तलवार पुर्खों की  विरासत और आने  वाली नस्लों की  अमानत थी.

बस यूं समझ लीजे कि दीदार ए काबा के बाद अगर कुछ था तो वो था दीदार ए तलवार ए मिराजुद्दौल.और इसके लिये कहीं दूर जाने की जहमत भी नहीं उठाना थी.

पर अनहोनी को भला  कौन टाल सकताहै ? वही हुआ जो ना होना चाहिये था – नवाब  की  तलवार चोरी हो गयी.

सुस्त शहरों मे सनसनी जल्दी फैलती है और ये तो लखनऊ था. चोरी की खबर ऐसी बिजली की तरह चमकी कि तमाम शहर के बाशिंदों मे करंट दौड गया. एक एक करके लोग मिजाज़पुर्सी के लिये नवाब की कोठी में  आने लगे.

सबसे पहले तशरीफ लाये लाला गनपत राय. मुंह लटकाये कुछ इस तरह से दीवानखाने में दाखिल हुए कि जैसे अभी अभी समूची रियासत अंग्रेज़ों के नाम कर आये हों.खैर लखनऊ में गम मनाने का भी एक सलीका हुआ करता है. ये नहीं कि लगे छाती पीट पीट के चिल्लाने. आहिस्ता से करीब आकर अपने पानदान से निकाल कर तम्बाक,ज़र्दे,केसर और ज़ाफरान वाली गिलौरी पेश की जाती है और जब आप बाकायदा यूं शरीक़ हो जायें तो हाथों में हाथ लेकर पूछा जाता है कि ‘ मियां ये कैसे हुआ ?’

यही नफासत है जो हम लखनऊ  वालों को दूसरो तो बेसलीका, जाहिल और गवांर समझने पर मजबूर कर देती है.

बहरहाल ये बातें सीखने में तो आपकी की कई नस्लें गुज़र जायेंगी सो हम किस्से को आगे बढाते हैं. तो लाला ने जब रसमन नवाब का हाथ अपने हाथों मे लिया और इस हिमाकत का हाल पूछा तो नवाब की आंखे डबड्बा आईं. ये भी ज़रूरी था वर्ना लाला को लगता कि हमारे हाल पूछने में वो गर्मी वो शिद्दत नही थी जो होना चाहिये थी.रुंधे गले से पान को कोने में दबाते हुए नवाब ने अर्ज़ किया:

अमां कल रात जब सोने गये तो यहीं इसी दीवार पर टंगी थी पर जब सुबह उठे  तो क्या देखते है कि तलवार गायब है.

यहीं  तो चूक गये आप ” लाला ने फरमाया.” हम  तो आपको निहायत ज़हीन और काबिल समझते थे पर आपने तो हमें अपनी राय बदलने पर मजबूर कर दिया.अब देखिये ये कोई मामूली चीज़ तो थी नहीं कि दीवार पर खुला टांग दिया और सो  गये.पुर्खों की अमानत को भला यूं संभाला जाता है. पर वही बात है कि जो नियामत इंसान को नाहक़ मिल जाती है वो उसकी कद्र नहीं समझ पाता.काश ये विरासत हमें बक्शी गयी होती तो आखों से चूम  कर माथे से लगाते .बंदर क्या जाने अदरख का स्वाद…….

अब नवाब खामोश न रह सके और ज़रा तुनक कर बोले ‘ लाला आप अपने जामे से बाहर आ रहे हैं.’ लाला ने बात संभाली ‘अरे आप तो यूं ही खफा हो गये ,हम तो चोर के लिये कह रहे थे. जाके बेच देगा किसी ऐरे गैरे को औने पौने कहीं नक्खास वक्खास में’. नवाब सोचने लगे बला जहां से  आयी थी वहीं पहुंच जायेगी,कौन बडी बात है.

खैर  लाला को जैसे तैसे रवाना  कर के अभी  नवाब  ने  एक  गिलास खस  का  शर्बत तलब ही किया था  कि  मुंशी  टेकचन्द  की आमद  हुई. आते  ही सबसे पेहले  तो हजरत ने  शर्बत पर  अपना हक़ जमा दिया और फिर  दाग दिया वही अशलील सवाल – मियां ये हुआ कैसे ? नवाब के  जी में  तो आया कि कह दें कि  खुदा का शुक्र  है कि तलवार चोरी हो गयी नहीं तो आप का कत्ल तो आज हमारे  हाथों  तय थे. पर क्या करते लखनवी  तेह्ज़ीब का बोझ नवाब के दिल ओ दिमाग से होते हुए अब उनके  वजूद पर्  कुछ इस तरह  भारी हो  चुका था कि चाहते तो भी उसे  उतार कर फेंक नहीं  सकते थे. मुस्करा कर बोले ‘ साहब क्या बताएं बुरा वक़्त बता कर तो आता नहीं  और हमारी फितरत भी कुछ यूं  है कि  सब पर  यकीन  कर लेते हैं. इतना एह्तियात तो हमनें  बरता था कि शाम को सोने से पेहले तलवार जो यूं तो दीवार पर सजी रेहती थी हमनें अपने  सिरहाने रक्खी और सो गये. हकीम साहब ने फर्माया था कि लोहा तकिये के नीचे रखने से बुरे  ख्वाब भी  नहीं  आते’. ये कह कर नवाब  ने सोंचा कि  अगर मुंशी मेरी कहानी  के कायल हो गये तो बस कल नौकरों  एक एक रुक्का लिख कर जारी कर देंगे और कह देंगे कि भई  ये रहा किस्सा  ए तलवार अब हमारी जान छोडो.

पर  वो गलत थे एकदम गलत …

मुंशी  बोले – अमां  ये क्या हरकत कर दी आपने हुज़ूर ! हम तो  आपको तमाम लखनऊ शहर की  दिमागी तरक्की  का  मुहाफिज़  समझते थे और आपने तो बस हमारा सारा भरम ही तोड  दिया. मियां इतने  सयाने तो आज  कल चौक के लौंडे हो गये हैं , जानते हैं  कि तिमारदारों  कि  कौम अब भरोसे के  कतई काबिल नहीं  रही. वो ज़माने  हवा हो गये जब वफादार मालिक की एक  नज़र पर जान पेश कर दिया करते थे. अब तो ज़रा चूक हुई नहीं कि ये लोग आखों  से सुरमा उतार लें. और् फिर  ये तो तलवार थी वो भी खानदानी –  हीरे जवाहेरात उसमें जडे हुए , मशहूर औ मारूफ , बच्चा बच्चा जिसके किस्से बयान  करते नहीं  थकता और आप हैं  कि बस यूं  ही सो गये तकिये के नीचे रख कर ! अरे हकीम साहब का दिल रखने का इतना ही शौक़ था तो बावर्ची खाने से कोई चाकू –  वाकू मंगवा लिया होता या फिर गुलाम को जहमत को जहमत दी होती.आपकी जेहनी खैरियत के लिये हम तोपखाने से किसी मरियल घोडे  की  नाल ले आये होते. दरोगा साहब हमारे जानने वालों मे शरीक़ होते हैं और हम अगर  आपकी  दिमागी हालत का वास्ता देते तो हमें  यकीन है कि वो हमें  मायूस न  करते’. नवाब बहुत झुंझलाये , समझ गये कि  मुंशी भिगो भिगो के जूती साफ  कर रहे हैं पर क्या करते तलवार और तेह्ज़ीब का मामला था.

डांट  कर नौकर तो ललब किया – ‘अमां फुक्कन मिया मुंशी साहब कोई खाली बगैर काम काज के नहीं  हैं  कि सारा दिन आपका इंतेज़ार करते रहें. अगर काहिली छोड  कर कुछ पका लिया हो तो लेते आइये वर्ना कम से कम एक कप चाय ही पेश कर दीजिये जो हम सीलोन से लाये थे’. फिर वो धीरे से बोले – ‘क्या करें सब कम्बखत मुंह लगे हैं सुनते ही नही. ना बात का ढंग है ना काम का सलीका.’ मुंशी समझ गये कि तीर निशाने पर लगा है लगा है और ये बातें नौकरों की जानिब से उन्हें सुनाई जा रही हैं. शराफत और खैरियत दोनों के  मद्दे नज़र उन्होंने ये ही मुनासिब समझा कि वहां से फूट लिया जाये. वैसे भी चौक में लस्सी के  ठेके के लिये बहुत मसाला जमा हो गया था.

नवाब खुश थे.ऊपर  वाले के करम से दोपहर के खाने के वक़्त लोगों ने उन्हें तन्हा छोड  दिया. पर असलियत तो ये थी कि छ्ज्जू की लस्सी की दुकान पर नवाब का मखौल उडाने वालों  की जो महफिल जमी वो दोपहर के खाने तक चलती रही. और आप जानते  हैं कि खाने के बाद तो लखनऊ वाले अगर क़यामत बर्पा हो जाये तो भी ना उठ्ठें. हाल फिलहाल झुटपुटे तलक नवाब को  परेशान करने कोई ना आया.

बुरा वक़ बता कर नहीं आता ये तो ठीक है पर ये बात भी दुरुस्त है कि  बुरा वक़्त आसानी से टलता भी नहीं.अभी  कारिंदे श्म्माओं  को  रौशन कर ही रहे थे कि आगा मीर की ड्योढी से  मिर्ज़ा असलम बेग तशरीफ ले  आये. उनके चांद से चमकते रुख्सार से ये साफ बयां हो रहा था कि दिन भर किसी मटरगश्ती से चूर होकर कुछ ऐसा सोये होंगे कि ख्वाब में में भी ज़ोर ज़ोर से हंस रहे होंगे.ना जाने क्यों पर  नवाब को यकीन था जो नूर  मिर्ज़ा के नूरानी चेहरे से टपक रहा था उसमें उनकें खिल्ली का कतरे खून बनकर तैर रहे थे. मिर्ज़ा को देखते ही वो एकदम चौक्कन्ने हो गये और कुछ ऐसे बैठ गये जैसे कि मिर्ज़ा के वार करते ही उनपर टूट  पडेंगे. मिर्ज़ा ने दीवानखाने में घुसते ही पान पेश किया और बहुत ही अफसोस भरी अलबत्ता रोनी सूरत बना कर कहा -‘हुज़ूर  ये क्या कर दिया. अब लखनअऊ का क्या होगा ‘?

नवाब  अब सब्र की इंतेहां  तक पहुंच चुके थे. उन्हें एक पल ऐसा लगा कि वो मिर्ज़ा का मुंह नोच लेंगे. पर इसे अंजाम देने के लिये ज्यों ही वो हरकत में आये आसमानों से उनकें लखनवी पुर्खों की रूह उन्हें सदाएं देने लगी. कहने लगी कि मिराज़ जो शराफत के पुतलों  का खिताब हमारी नस्लों को अता किया जाता रहा है उसकी तौहीन मत करो. इसे मिर्ज़ा की नादानी और अल्ला की मर्ज़ी समझ कर जज़्ब कर जाओ. जन्नत में तुम्हारी जगह हम पक्की किये रहेंगे. मरता क्या ना करता नवाब ने खुद को खुदा के लिये संभाला और बोले -‘अमां लखनऊ तो तब भी बलंद और क़ायम रहा जब फिरंगी जाने ए आलम ( नवाब वाजिद अली शाह का एक खिताब) को श्हर की सडकों पर लिये घूमते रहे जैसे कि बंदर का खेल हो , ये तो बेचारी एक बेजान , बे जबान तलवार थी.’ नवाब के मिज़ाज़ की तल्खी को मिर्ज़ा भांप गये मगर अब जिस काम को आये थे उसे तो अंजाम देना ही था. सो बोले – ‘हुआ क्या था ???’

नवाब  को ऐसा लगा जैसे वो गश खाके गिर जायेंगे – झूटी तलवार के लुटने की सच्ची दास्तान जिसमे वो आधे अहमक़ थे और आधे शैतान अब उनसे और झेली नही जा रही थी. हाथ कत्ल करने पर अमादा थे पर दिल उन्हें उनकी शराफत का वास्ता देकर रोक देता था. अपनी सारी हिम्मत तलब करके बोले – ‘अरे साहब अब क्या कहें हम तो ये बात अच्छी तरह जानते थे कि तमाम ज़माने की , खास कर कि हमारे नमक हराम नौकरो की नज़र हमारी पुश्तैनी तलवार पर है सो हमने बडे एह्तियात से मयान मे डाल कर तहखाने में  तिंजोरी में सात तालों में बन्द करके रक्खा था. ना जाने कहां से सुल्ताना डाकू के अंडे बच्चे शहर में आ गये है कि वहां से भी उडा ले गये.हम तो केहते हैं मिर्ज़ा अब ये शहर हमारे आपके जैसे शरीफों  के लिये महफूज़ नहीं  रहा. ज़रूरी है कि आप भी ज़रा संभल के रहें.’

मिर्ज़ा  गहरी सोच में डूब गये और कुछ देर बाद दाढी पर हाथ फेरते हुए बोले -‘ नवाब साहब अगर हम आपकी जगह होते तो कभी इतनी ज़ाहिर सी जगह पर इस कदर नायाब चीज़ ना धरते. हम तो साह्ब ऐसी जगह छुपाते कि सात पुश्तें भी सुराग  ना लगा पातीं कि तलवार शाम होते होते ही जाती कहां है.रख देते चावलों के गोदाम में किसे बोरी में छुपा कर. किसका दिमाग इतना चलता कि हमारी होशियारी के  आगे अपनी चला पाता. वो तो ठहरे अकल के पैदल.मुल्ला की दौड मस्जिद तक, तिजोरी का ताला तोडते और अन्दर मिलता हमारे हाथों क लिखा पर्चा – मियां अभी बादाम खाओ, तुम्हारे जैसे लौंडे तो जेब में मोमफली के साथ रखते हैं और गाहे बगाहे चबा जाया करते हैं.’ असलम बेग के चेहरे में शैतान की सूरात साफ दिखायी दे  रही थी.वो आगे बोले –

‘अब  क्योंकि आप हमारे साथ कंचे खेले हैं और पतंग बाज़ी के पैंतरे भी जानते हैं हम समझे कि आप भी हमारी तरह ही तेज़ दिमाग से सोचेंगे.पर हम गलत थे लडकपन की मुराही जवानी की मुकम्मल दिमाग मे तब्दील हो ये ज़रूरी नहीं है. खैर जो हुआ सो हुआ, हम अब रुक्सत चाहेंगे … बडा अफसोस हुआ.’

मुंशी ने तो फिर भी जूते भिगो भिगो कर मारे थे मिर्ज़ा ने तो मारे दस गिने दो. “या अल्लाह ये कैसा फसाद पैदा कर दिया.इससे कभी निजात मिलेगी भी या नहीं.”

अगले  दिन सुबह सुबह दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई. नौकरों ने आकर बताया कि कोतवाल साहब हाज़िर होना चाहते हैं कहिए तो लिवा लायें. नवाब क्या केहते – जान गये कि अभी उन्हें जल्दी मौत नहीं  आयेगी.कुछ ही देर मे कोतवाल साहब नवाब  मिराजुद्दौला के हुज़ूर में तशरीफ फर्मा थे. सवाल वही – तलवार कैसे चोरी हो गयी !!!!!!

नवाब मिराजुदौला फरिश्तों जैसे तो थे मगर फरिश्ते नहीं थे. उनमे वो सब कमियां मौजूद थीं जो अक्सर इंसानों में पायी जाती है मसलन गुस्सा , खीज, बदसलूकी,वहशत, दीवानापन ……. नवाब का चेहरा तमतमा गया और वो  जैसे बिराते हुए अपना बयान देने लगे. चिल्ला कर बोले – ‘कोतवाल साहब हुआ यूं  कि हम तलवार से बहुत तंग आ चुके थे सो हमने सोचा कि लाओ आज अपना काम इसी से ताम किये लेते हैं. आव  देखा ना ताव तलवार को अपने सीने में घोंप लिया और बिस्तरे पर लेट गये. सुबह देखा तो हम तो थे पर तलवार ना थी. अब बताइये कि क्या करें ?’

दरोगा जी ज़रा देर तो सकते में आ गये फिर सोचने लगे. थोडी देर बाद तफतीश के लहज़े उन्होंनें कुछ यूं दर्याफ्त किया – ‘आप गलती कर गये , हुआ यूं होगा कि जब आप तलवार को सींसे में घुसेड कर औंधे पडे होंगे तभी चोर आया होगा. उसने आपको बेहोश देखा होगा और सोचा होगा कि देखें सो रहे है या जग रहे हैं.ज़ैसे ही आपको पलटा होगा उसे तलवार की मुठ दिखायी दे गये होगी. उसने सोचा होगा दुनिया भर की चीज़ें लादने से अच्छा ये बेश्कीमत नगीना ही क्यों ना हथिया लिया जाये.तलवार को मुठ पकड कर खींचा होगा और ये जा वो जा.आपने अपने जांबाज़ पुर्खों का नाम लेकर ज़रा ज़ोर और लगाया होता तो आज आप भी शहीद हो चुके होते और आपके मरहूम दादाजान की निशानी भी रह जाती.’

नवाब अब कुछ और सोचने समझने के काबिल ना रह सके थे.आस पास का माहौल सुन्न सा हो गया और दूर किसी कोठे से रियाज़ की आवाज़ आने लगी. गालिब का कलाम था शायद  :

ये कहां की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासेह्, कोई चारागार होता कोई गमगुसार होता

हुए  मर के हम जो रुसवा हुए क्यों ना गर्के दरिया, ना कहीं जनाज़ा उठता ना कहीं मज़ार होता……

~ आहंग

** ये किस्सा बहुत अर्सा पेहले किसी दोस्त नें एक लतीफ के तौर पर शार्ट में सुनाया था. हमें लगा कि लखनऊ के मिजाज़ के साथ ज्यादती हुई है सो यहां अपने ब्लाग पर तफसील से बयान करने की हिमाकत की है.उम्मीद है कि आपको पढ कर मज़ा आयेगा और जो ना आये तो मेरी बला से….!

झूटा सच्चा मत सोचा कर

बहुत साल हुए मेहंदी हसन साहब की ये गज़ल सुनी थी.आज ना जाने क्यों,
अचानक ही याद आ गयी........
तन्हा तन्हा मत सोचा कर, मर जायेगा मत सोचा कर
प्यार घडी भर को ही बहुत है, झूटा सच्चा मत सोचा कर
धूप में तन्हा कर जाता है ,क्यों ये साया मत सोचा कर 
अपना आप गवां कर तूने ,पाया है क्या मत सोचा कर...
<a href="http://www.youtube.com/embed/j_K-JVFgxss">

अपना ही इंतेज़ार किया है मैनें कई शाम …

खुदाया ये बेखुदी कि खुद के साथ बैठ कर

अपना ही इंतेज़ार किया है मैनें कई शाम …

तमाम चेहरों में कौन सा चेहरा है मेरे दोस्त

है खुद से ये सवाल किया मैनें कई शाम…

इस आग के दरिया की मैं भी तो लहर  हूं

सोचा है साहिल पर खडे  रहके मैनें कई  शाम…

ये कैसी कशमकश है ये कैसा जुनूं है

समझा तो नहीं पर सोचा है यही मैनें कई शाम..

एक चांद को तारों से करते बात देखकर

ढूंढा है अपना भी आसमान कई शाम …..

– आहंग