अपना ही इंतेज़ार किया है मैनें कई शाम …

खुदाया ये बेखुदी कि खुद के साथ बैठ कर

अपना ही इंतेज़ार किया है मैनें कई शाम …

तमाम चेहरों में कौन सा चेहरा है मेरे दोस्त

है खुद से ये सवाल किया मैनें कई शाम…

इस आग के दरिया की मैं भी तो लहर  हूं

सोचा है साहिल पर खडे  रहके मैनें कई  शाम…

ये कैसी कशमकश है ये कैसा जुनूं है

समझा तो नहीं पर सोचा है यही मैनें कई शाम..

एक चांद को तारों से करते बात देखकर

ढूंढा है अपना भी आसमान कई शाम …..

– आहंग

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21 comments on “अपना ही इंतेज़ार किया है मैनें कई शाम …

  1. bhut hi dilchassap hai

  2. anushka says:

    very tru bhut hi kamaal likhte hai

  3. Very nice i just love this…

    खुदाया ये बेखुदी कि खुद के साथ बैठ कर

    अपना ही इंतेज़ार किया है मैनें कई शाम …

    Beautiful…

    • aahang says:

      शुक्रिया ! आप खुद अच्छा लिखती हैं तो आपके लफ्ज़ों का वज़न कुछ और है……I am glad you liked my blog.

  4. anuj says:

    lazabab

  5. vikash sharma says:

    very nice i want some more because i wanted that…. vikash

  6. shilpa says:

    bahut khoob

  7. anubha says:

    very nice indeed

  8. anubha says:

    Agar ye aapne likhi hai to bahut hi achhi hai…..kuchh fayde tanhai ke bhi….

  9. Sunil says:

    marvelous thought & expression
    thanx for sharing

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