उलझे कभी ज़मीन से कभी आसमाँ से हम…

इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुये आसमाँ से हम| 
हटकर चले हैं रहगुज़र-ए-कारवाँ से हम| 

क्योंकर हुआ है फ़ाश ज़माने पे क्या कहें, 
वो राज़-ए-दिल जो कह न सके राज़दाँ से हम| 

हम्दम यही है रहगुज़र-ए-यार-ए-ख़ुश्ख़िराम, 
गुज़रे हैं लाख बार इसी कहकशाँ से हम| 

क्या क्या हुआ है हम से जुनूँ में न पूछिये, 
उलझे कभी ज़मीं से कभी आसमाँ से हम| 

ठुकरा दिये हैं अक़्ल-ओ-ख़िराद के सनम्कदे, 
घबरा चुके हैं कशमकश-ए-इम्तेहाँ से हम| 

बख़्शी हैं हम को इश्क़ ने वो जुर्रतें ‘मज़ाज़’, 
डरते नहीं सियासत-ए-अहल-ए-जहाँ से हम

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