पंडित कौन ?

दफ्तर में चर्चा के दौरान एक मित्र ने कहा कि योगी तो पंडित जी जैसा लग रहा था so I was skeptical if he will he be able to achieve anything or not ? ये विचार तो सबके मन में आया होगा पर योगी ना सिर्फ Physics, Chemistry, Maths से स्नातक हैं वरन एक दोस्त के अनुसार उन्होंने CAT भी qualify किया था , MBA करने के लिए। वेशभूषा हमें कितना भृमित करती है ये मैनें कॉरपोरेट जगत में भी अक्सर देखा है। देखने में टिप टॉप लगना चाहिए काम चाहे दो कौड़ी का ना आता हो। खैर यहां तो जो बात बताना चाहता हूं वो ये है कि हिन्दू धर्म में “पंडित” के भी कई लेवल हैं :
पुजारी – ये केवल मंदिर का रख रखाव, भगवान की पूजा अर्चना, उनको स्नान कराना, कपड़े बदलना, श्रृंगार वगैरह केराने के लिए नियुक्त किये जाते हैं । मंदिर की आय का एक भाग इन्हें जीविकाकोपार्जन के लिए मिलता है।

पुरोहित – ये अपने यजमानों के यहां कथा, अनुष्ठान, संस्कार आदि करवाते हैं और इन कार्यों के लिए दी गई दक्षिणा ही इनकी आय का मुख्य स्रोत है।

पंडित – हर कोई पंडित नहीं होता। ये एक उपाधि है जो कि किसी एक या अनेक विषयों पर शोध अथवा अधिकार प्राप्त कर लेने पर दी जाती है। 

गुरु – आज कल हर तरफ गुरुओं का बोलबाला है पर पंडित का ही अगला लेवल गुरु है जहां किसी एक विषय पर नहीं बल्कि अनेक विषयों पर ना सिर्फ ज्ञान प्राप्त कर लिया जाता है बल्कि जीवन के प्रति एक समझ, एक दृष्टिकोण भी अपेक्षित होती है। गुरु को शिक्षक भी कहते हैं पर ये विमर्श का विषय  है।

पुजारी, पुरोहित,पंडित और गुरु के लिए सन्यासी होना आवश्यक नहीं है ना ही दीक्षा लेना या स्वयं का पिंडदान करना । ये सभी पद सांसारिक हैं।

सद गुरु – आज कल सद गुरु कहिये तो जग्गी वासुदेव जी का चेहरा सामने आ जाता है। पर सद गुरु दरअसल वो है जो हमें सत्य की राह पर चलना सिखाये। और ये कोई मामूली सत्य नहीं है ये जीवन का सत्य है । एक जीवात्मा की परमात्मा से मिलने की खोज है । सद गुरु पर ईश्वर की कृपा होती है और वो अपने शिष्य की पूरी जिम्मेदारी लेता है क्योंकि शिष्यअपने गुरु पर पूर्णतः समर्पित होता है, आश्रित होता है। उसको दृढ़ विश्वास होता है कि ज्ञान और मुक्ति दोनों सद गुरु के चरड़ो में प्राप्त होंगे। क्योंकि ये ज्ञान गूढ़ है, संसार के परे है इसे देने या प्राप्त करने का अधिकारी बनने के लिए कई जन्मों की तपस्या आवश्यक होती है। जब हम गुरु शिष्य परम्परा की बात करते हैं तो इसी श्रेड़ीं की बात हो रही होती है।

आदि गुरु – ये शिव हैं । शिव ही ज्ञान का स्त्रोत हैं । समक्ष ज्ञान शिव से ही प्रस्फुटित होता है और उन्हीं में समा जाता है। शिव से बड़ा ना कोई योगी है और ना कोई ज्ञानी है। शिव को जान लेना सृष्टि के समस्त रहस्यों को जान लेना है और इसका मार्ग भी स्वयं शिव ही प्रशस्त करते हैं । 

तो बंधुओं अगली बार जब आप किसी भगवा धारी को देखें तो ये जानने की कोशिश करें कि उस व्यक्ति को क्या कह कर संबोधित करना उचित होगा ?

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