Osho quotes Majaz Lucknowi

मेरे किये जो हो सकता है, वह मैं कर रहा हूं। लेकिन तुम भी हाथ बढ़ाओ। मैंने तुम्हारे द्वार पर दस्तक दी है, कम से कम दरवाजा खोलो!
नहीं तो ऐसा न हो कि तुम समझदारी में बैठे ही रह जाओ। यह मधुशाला सदा न खुली रहेगी। कोई मधुशाला सदा नहीं खुली रहती है। द्वार-दरवाजे बंद होने का समय आ जाएगा।
उस महफिले-कैफो-मस्ती में,

उस अंजुमने-इर्फानी में

सब जाम-बकफ बैठे ही रहे,

हम पी भी गये, छलका भी गये ~मजाज़ 

तुम बुद्धिमानों की सभा जैसी सभा मत बना लेना अपनी।
उस अंजुमने-इर्फानी में

–बड़े बुद्धिमानों की सभा थी।

उस महफिले-कैफो-मस्ती में

–मस्ती और आनंद और उल्लास के क्षण में बुद्धिमानों की बड़ी सभा थी।

सब जाम-बकफ बैठे ही रहे

–बुद्धिमान थे, कैसे पीएं! तो अपने जाम सामने रखकर बैठे ही रहे। गैर-बुद्धिमान जो थे–हम पी भी गये, छलका भी गये!

पी लो और छलका लो! कब तब जाम लिये बैठे रहोगे? किसकी राह देखते हो? कोई कहे? किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो? समय बीता जाता है। पल-पल, घड़ी-घड़ी मधुशाला के द्वार बंद होने का समय आया जाता है। फिर मत रोना! अभी अपनी करोगे, फिर मत चीखना-चिल्लाना! क्योंकि बंद दरवाजों के सामने चीखने-चिल्लाने से फिर कुछ भी नहीं होता।

और मैं कहता हूं, ऐसा बहुत-से लोग कर रहे हैं। महावीर को गये पच्चीस सौ साल हो गये, कितने लोग अभी भी उस दरवाजे के सामने चीख रहे, चिल्ला रहे हैं! उन्हीं को जैन कहते हैं। बुद्ध को गये पच्चीस सौ साल हो गये, कितने लोग उस दरवाजे के सामने प्याले लिये खड़े हैं कि खोलो द्वार, हम प्यासे हैं; भरो हमारे प्याले! लेकिन मधुशाला जा चुकी! उन्हीं को तो बौद्ध कहते हैं। 

ऐसे ही ईसाई हैं, हिंदू हैं, मुसलमान हैं..

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