Conversation

तुम मुख़ातिब भी हो करीब भी हो,

तुमको देखूँ कि बात करूं तुमसे!

Now that I have your attention,

Should I converse or just keep looking!

Advertisements

धरती का बोझ

आज इस पृथ्वी पर 7.5 अरब लोग हैं । ठीक एक सौ साल पहले ये संख्या शायद इसकी एक तिहाई यानी ढाई से तीन अरब रही होगी। अब धरती और उसकी धारण क्षमता तो वही है पर बोझ तीन गुना हो गया। यही वजह है कि आज पर्यावरण पर इतनी चर्चा होने लगी है। समस्त चेष्टा इस ओर केंद्रित है कि इस विनाश को कैसे रोका जाए या रोका अगर ना भी जा सके तो कम से कम इसकी गति धीमी कर दी जाए। सारे उपाय भी इसी दिशा में किये जा रहे हैं कि ज़्यादा लोग जो और भी ज़्यादा हो जाएंगे, वो कैसे धरती के साधनों का इस्तेमाल किफायत से करें, कम करें या फिर अगर हो सके तो बन्द कर दें।

पर आज राम रहीम के समर्थकों और कई साल से जिहादियों की हरकतों को देख कर एक विचार आया कि क्या जीने का अधिकार वाकई एक मौलिक अधिकार है? और अगर है तो किसने इसे निर्धारित किया? प्रकृति नें तो नहीं क्योंकि वहां तो ये सिद्धान्त लागू नहीं होता। और अगर गहराई से हम मानव जीवन के उद्देश्य के बारे में सोचें तो वो तो मोक्ष या निर्वाण ही हो सकता है। पर उसके लिए एकांत चाहिए, शांति चाहिए,प्रचुर साधन चाहिए जिससे मानव किसी भी चिंता अथवा भय से मुक्त होकर मनन और चिंतन कर सके। एक विकसित अवस्था की न सिर्फ कल्पना कर सके बल्कि उसे पाने के लिए अबाधित रूप से प्रयास कर सके। जिन गुनी ज्ञानी जनों ने उपनिषद और वेद सभ्यता को दिए वो निश्चित ही एक अलग तरह के समाज की उपज थे।

परन्तु इसमें राम रहीम के भक्त, जिहादी, जाहिल, गंवार, पशु मानसिकता वाले लोग रुकावट हैं , बहुत बड़ी रुकावट हैं क्योंकि ये सारे समाज की आध्यात्मिक दशा और राजनैतिक दिशा दोनों बदल देते हैं। क्योंकि भीड़ का अपना एक बल होता है जिसे आज कल लोकतंत्र भी कहा जाता है वो बल ये भीड़ धूर्तों, बेईमानों और पाखण्डियों के हाथ में दे देती है। राजनेता इसी बल का उपयोग हमारे साधन छीन कर इन बहुसंख्यक कीटों को देकर इनके वोट खरीद लेते हैं और सत्ता पर काबिज़ हो जाते हैं। ये एक तरह का communsalism का संबंध है जिसमें धूर्त मूर्खों और अज्ञानियों के बल पर सबकी ऐसी तैसी किये रहते हैं। इस व्यवस्था को जाना होगा। जो अपने विषय में कुछ तय नहीं कर सकता हम क्यों उसे हमारा जीवन कैसा हो ये तय करने का अधिकार दें। अगर देंगे तो यही होता रहेगा, बल्कि और बढ़ेगा।

जर्मनी के विद्वान विचारक फ्रेडरिक नीतज़े नें उबर मैन की परिकल्पना की थी – एक ऐसा सुपरमैन जो शारीरिक और मानसिक दृष्टि से पूर्ण हो । जो निर्वाण जैसी अवस्था को अगर पा न चुका हो कम से कम उसकी ओर बहुत तेजी से बढ़ रहा हो। उसके इसी दर्शन को आधार बना कर हिटलर ने एक सुपीरियर रेस, जिसे उसने आर्यन रेस का उत्तराधिकारी कहा, की नींव रखी थी। उसका मानना था कि जीने का अधिकार कोई मौलिक अधिकार नहीं है क्योंकि किसी के जीने या मरने से प्रकृति को कोई फर्क नहीं पड़ता । प्रकृति तो खुद ही सिर्फ उन्हें जीने का अधिकार देती है जो उसके काबिल हों।

मुझे लगता है कि आज के काल खंड में उबर मैन और भी प्रासंगिक है । साधन कम हैं और उनका दोहन करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। क्या ये उचित नहीं होगा कि कुछ लोगों को कम कर दिया जाए। चूंकि वो कभी भी एक विकसित अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकते वो सिर्फ साधनों को बांट कर खत्म कर रहे हैं। हिटलर एक गुंडा था और मुझे लगता है कि नीतज़े की गूढ़ बातों को वो समझ भी नहीं पाया होगा। मेरा मानना है कि सबको बराबर अधिकार मिलना चाहिए पर कहीं न कहीं ये भी तय होना चाहिए कि ये व्यक्ति उन सीमित संसाधनों के लायक भी है या नहीं !अगर नहीं है तो शायद वैसा ही कोई उपाय करना होगा जैसा हिटलर नें किया था।

कुछ रोज़ पहले मेरे घर में चींटों का आक्रमण हुआ। पहले तो ये इक्का दुक्का इधर उधर दिखते थे पर जब हमने ‘जियो और जीने दो’ के फलसफे को अपनाते हुए इन्हें नहीं मारा तो देखते ही देखते ये सब जगह हो गए। जब एक रोज़ रात में अचानक मेरी नींद खुली तो मैनें पाया कि चींटे मेरे ऊपर ही रेंग रहे हैं। अगले ही दिन हमने पेस्ट कंट्रोल वाले को बुलाया और उसने इनकी कॉलोनी को ढूंढने के बाद बड़ी निर्ममता के साथ मेरे सामने चींटों की हत्या कर दी। उसने जाते जाते ये भी कहा कि मेरे जाने के बाद अगर एक भी चींटा कहीं भी दिख जाए तो फौरन मार दें अन्यथा ये फिर से चारों तरफ हो जाएंगे। अब जहाँ भी कोई चींटा दिखता है में तुरंत उसे पैरों तले कुचल देता हूँ । जियो और जीने दो का सिद्धांत गया तेल लेने अब मैं चींटों की मौत को यूं जस्टिफाई करता हूँ – ये साले धरती के बोझ वैसे भी ज़्यादा जी कर क्या उखाड़ लेते? नया जन्म किसी दूसरी योनि में होगा तो एक नई संभावना तो उपजेगी – एक तरह से मैं उपकार ही कर रहा हूँ ….

Miracle

Friend – In this age of science you believe in miracles!

Me – You have no idea what is science

Friend – why ?

Me – Science is the miracle. Ask any scientist..

Now, I am not afraid..

मुझे अब डर नहीं लगता

किसी के दूर जाने से

ताल्लुक टूट जाने से

किसी के मान जाने से

किसी के रूठ जाने से

मुझे अब डर नहीं लगता

किसी को अजमाने से

किसी के अजमाने से

किसी को याद रखने से

किसी को भूल जाने से

मुझे अब डर नहीं लगता

किसी को छोड़ देने से

किसी के छोड़ जाने से

न शमा को जलाने से

न शमा को बुझाने से

मुझे अब डर नहीं लगता

अकेले मुस्कराने से

कभी आंसू बहाने से

न इस सारे ज़माने से

हकीकत से फ़साने से

मुझे अब डर नहीं लगता

किसी की नारसाई से

किसी की परसाई से

किसी की बेवफाई से

किसी दुःख इंतेहाई से

मुझे अब डर नहीं लगता

न तो इस पार रहने से न

तो उस पार रहने से

न अपनी जिंदगानी से

न इक दिन मौत आने से

मुझे अब डर नहीं लगता

मोहसिन नक़वी

मजाज़ और मैं( Me and Majaz)

मजाज़ की शायरी से मेरी मोहब्बत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि नौ बरस पहले जब मैनें अपना ब्लॉग शुरू किया तो मुझे “आहंग” के अलावा कोई और नाम सूझा ही नहीं। कहते हैं मजाज़ नें इंक़लाब को गुनगुनाया उसका नारा बलंद नहीं किया। उनकी बगावत सबसे पहले खुद से शुरू हुई और बाद में उसमें पूरा ज़माना शामिल हो गया। एक अजीब सा दुख है बर्बादी के जश्न को मनाये जाने का। मजाज़ सबसे नाराज़ मालूम होते हैं पर अगर गौर किया जाए तो उन्होनें किसी को इस लायक भी नहीं समझा। नाराज़ होना भी एक तरह का कमिटमेंट है मजाज़ के लिए। । हां अगर confusion कहें तो कुछ कुछ पकड़ बनती है उनकी शख्सियत की – जैसे समझ ही ना पा रहे हों कि आखिर ये सब क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है। ज़िन्दगी का कोई मकाम न सही कोई मायने तो होंगे – पर धीरे धीरे यकीन होने लगता है की ऐसा मुमकिन ही नहीं है। कोई भी कोशिश बेईमानी होगी खुद से। बस यहीं हम जुड़ जाते हैं मजाज़ से – जहां कुछ भी या कोई भी किसी से जोड़ा नहीं जा सकता। बात थोड़ी पेंचीदा लगेगी आपको पर कभी ज़ेहन की कैफ़ियत मेरे जैसी हुई तो सब साफ साफ दिखाई देने लगेगा। बहरहाल ये ग़ज़ल पेश है मजाज़ की अपनी आवाज़ मैं :

कुछ तुझ को ख़बर है हम क्या क्या ऐ *शोरिश-ए-दौराँ भूल गए, *tumultuous time

वो ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ भूल गए वो *दीदा-ए-गिर्यां भूल गए *tearful eyes

ऐ शौक़-ए-नज़ारा क्या कहिए नज़रों में कोई सूरत ही नहीं,

ऐ *ज़ौक़-ए-तसव्वुर क्या कीजे हम सूरत-ए-जानाँ भूल गए *excitement of imagining

अब गुल से नज़र मिलती ही नहीं अब दिल की कली खिलती ही नहीं,

ऐ फ़स्ल-ए-बहाराँ रुख़्सत हो हम *लुत्फ़-ए-बहाराँ भूल गए *joy of spring season

Old Man and the Sea

I had bought this one some 15 years ago. It was a thin book may be a 100 odd pages but I found it too boring to go beyond some 15-20 pages and gave up. I picked it up again a few years ago but once more I couldn’t manage to cross the threshold. But like the old man I am also a stubborn guy so I picked it up again today.This time I could totally relate to the characters and the story – the old man’s struggle, the challenging spirit of the Merlin, the cruel destiny in the form of sharks, the apathy of people and relations, love of the young apprentice and finally the fact the fight to prove is only with oneself. I guess as years add up they bring more clarity about life, about who we are and what it means to be living. That’s the principle difference between growing old and getting old. Now I can die in peace without the fear of facing Hemingway – what you never finished reading my book !! How fishy ??