मजाज़ और मैं( Me and Majaz)

मजाज़ की शायरी से मेरी मोहब्बत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि नौ बरस पहले जब मैनें अपना ब्लॉग शुरू किया तो मुझे “आहंग” के अलावा कोई और नाम सूझा ही नहीं। कहते हैं मजाज़ नें इंक़लाब को गुनगुनाया उसका नारा बलंद नहीं किया। उनकी बगावत सबसे पहले खुद से शुरू हुई और बाद में उसमें पूरा ज़माना शामिल हो गया। एक अजीब सा दुख है बर्बादी के जश्न को मनाये जाने का। मजाज़ सबसे नाराज़ मालूम होते हैं पर अगर गौर किया जाए तो उन्होनें किसी को इस लायक भी नहीं समझा। नाराज़ होना भी एक तरह का कमिटमेंट है मजाज़ के लिए। । हां अगर confusion कहें तो कुछ कुछ पकड़ बनती है उनकी शख्सियत की – जैसे समझ ही ना पा रहे हों कि आखिर ये सब क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है। ज़िन्दगी का कोई मकाम न सही कोई मायने तो होंगे – पर धीरे धीरे यकीन होने लगता है की ऐसा मुमकिन ही नहीं है। कोई भी कोशिश बेईमानी होगी खुद से। बस यहीं हम जुड़ जाते हैं मजाज़ से – जहां कुछ भी या कोई भी किसी से जोड़ा नहीं जा सकता। बात थोड़ी पेंचीदा लगेगी आपको पर कभी ज़ेहन की कैफ़ियत मेरे जैसी हुई तो सब साफ साफ दिखाई देने लगेगा। बहरहाल ये ग़ज़ल पेश है मजाज़ की अपनी आवाज़ मैं :

कुछ तुझ को ख़बर है हम क्या क्या ऐ *शोरिश-ए-दौराँ भूल गए, *tumultuous time

वो ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ भूल गए वो *दीदा-ए-गिर्यां भूल गए *tearful eyes

ऐ शौक़-ए-नज़ारा क्या कहिए नज़रों में कोई सूरत ही नहीं,

ऐ *ज़ौक़-ए-तसव्वुर क्या कीजे हम सूरत-ए-जानाँ भूल गए *excitement of imagining

अब गुल से नज़र मिलती ही नहीं अब दिल की कली खिलती ही नहीं,

ऐ फ़स्ल-ए-बहाराँ रुख़्सत हो हम *लुत्फ़-ए-बहाराँ भूल गए *joy of spring season

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