वो गज़ल आपको सुनाता हूँ

जिसको मैं ओढ़ता बिछाता हूँ
वो गज़ल आपको सुनाता हूँ

हर तरफ ऐतराज़ होता है
जब भी मैं रौशनी में आता हूँ

तू किसी रेल से गुजरती है…

( दुष्यंत कुमार को याद करते हुए )

Mirror

एक वक़्त ऐसा आता है

ज़िन्दगी में जब

आप ख़ुद को देखते हैं

शीशे में

और ज़ेहन में एक खयाल आता है

मैं यही हूँ और

अब ऐसे ही जीना होगा

उस वक़्त या तो

आप ख़ुद को स्वीकार कर लेते हैं

या खुदकशी कर लेते हैं

या कसम खाते हैं –

शीशे के सामने फिर कभी ना जाने की..

Tennessee Williams के एक लेख से प्रेरित

Who was Ghalib ?

ये मसाइल-ए-तसव्वुफ,ये तेरा बयान गालिब,
तुझे हम वली समझते, जो न बादाख्वार होता…
These matters of spirit and the way you tell about them
We would have considered you a sage, had you not been a drunkard..

( On Ghalib’s birth anniversary)