परिंदे

तुम परिंदों से ज़ियादा तो नहीं हो आज़ाद

शाम होने को है अब घर की तरफ़ लौट चलो

~ इरफान सिद्दीकी

ये धूप किनारा

ये धूप किनारा शाम ढले मिलते हैं दोंनो वक्त जहाँ जो रात न दिन, जो आज न कल पल भर में अमर, पल भर में धुंआँ इस धूप किनारे, पल दो पल होठों की लपक, बाँहों की खनक ये मेल हमारा झूठ न सच क्यों रार करें, क्यों दोष धरें किस कारण झूठी बात करें जब तेरी समन्दर आँखों में इस शाम का सूरज डूबेगा सुख सोयेंगे घर-दर वाले और राही अपनी राह लेगा There is a history of this Faiz Nazm with me and no it’s not romantic. Actually, I was once asked to compere at a Wal Mart Blr get together and I read this poem among a crowd of South Indian friends who were like – what is he even saying man !! It was quite embarrassing. The memory just came back today when I heard this beautiful rendering by Tanya. Life is fun..👍🏼😄

People

People were interesting at first. Then later, slowly but surely, all the flaws and madness would manifest themselves.

I would become less and less to them; they would mean less and less to me.

~ Charles Bukowski