अचिंत्य रचना

जगत की एक एक वस्तु को ध्यान  से  देखें तो इतनी  आश्चर्यजनक ,अदभुत रचना दीख पडती हैकि यह किसी छोटी बुद्धी की प्रक्रुति का निर्माण हो ही नहीं सकता. पशु पक्षी ,मनुश्य ,द्रुश्य अद्रुश्य  , छोटे बडे , परस्पर विचित्र – ऐसी रचना कि यह किसी मायावी का जादू भरा खेल ही  लगता है.शून्य आकाश में वायु को गतिशील करना , वायु की गति से तेज की स्रुष्टी करना , तेज की ऊश्मा से जल बनाना ,जल को जमाकर  प्रुथ्वी बनाना और इन्ही पंचभूतों के मिश्रण से अनेक स्वभाव ,गुन, आक्रुति ,व्यक्ति जाति – जो कि परस्पर विरुद्ध है , को  बनाना – क्या जड की स्वाभाविक  क्रिया से हो सकता  है? एक ही धरती में नाना बीज  बोते हैं एक ही साथ . गन्ने का बीज मधुर  रस खींचता है , मिर्च का बीज तिक्त रस खींचता है. उसी धरती से  रस लेकर  कतु , कषाय , अम्ल सब प्रुथक प्रुथक बनते हैं.पूर्व पूर्व संस्कार अनुसार अर्थ व्रुत्ति ,काम व्रुत्ति , धर्म व्रुत्ति  और मोक्ष व्रुत्ति के लोग अलग अलग हो जाते हैं- कोई स्त्री तो कोई पुरुष , कोई पशु तो कोई पक्षी ,कोई चींटी तो कोई हाथी, ;कोई केंचुआ तो कोई सिंह,इस विषमता में एक समस्त्ता काम कर रहीहै.वही  सर्वग्य एवं सर्वानंन्द  स्वरूप है.जो  कोई  भी  इस  स्रुष्टि  का गम्भीरता पूर्वक निरीक्षण करेगा ,अंवेष्णा -गवेषणा करेगा ,उसकी संकीर्ण द्रुष्टी मिट जायेगी ,उदीर्ण द्रुश्टी का उदय होगा  और वो ईश्वर की सत्ता साक्षात्कार कर सकेगा.इतना अवश्य है किजो मैं मेरा और तू तेरा की धारणा में आबद्ध होगा , उसके लिये ईश्वर सत्ता का अपरोक्ष होना कठिन  है.

ईश्वर सबका शरीरी है

एक मनुश्य के शरीर मे इतने कीटाणु होते हैं जितने सारी स्रुष्टी में मनुष्य नहीं हैं .उनमें अलग अलग चेतना होती है ,अलग अलग स्वभाव होते हैं, दल बंदी होती है.कोईरोग देते हैं कोई अरोग्य.परंतु उन सबको एक मनुश्य ,अपना ‘मैं’ मानता है.  शरीर ही मै है तो  उसके कीटाणु  मै हो ही गये. इन सबको  “मैं’ कहने  वाला जैसे  शरीर में  जीव होता है  ,उसी प्रकार सम्पूर्ण  विश्व में जितने  भी  प्राणी है , जीव जंतु  हैं – अलग अलग  स्वभाव  अलग अलग गुण धर्म ,अलग अलग जाते , अलगअलग व्यक्ति ,उनका परस्पर  राग द्वेश , दलबंदी – सब का सब एक ईश्वर के शरीर में  है. वही  स्रुष्टी कर्ता है, वही सबका भरण पोषण करने वाला भर्ता है और  वही  संहार  कर्ता है. जैसे हम  अपने शरीर को ‘मैं’ मानते है ,वैसे ही  वह सम्पूर्ण विश्व को मै  के रूप  में जानता है. जैसे हम  कुछ खा पी कर कीटाणुओं  की कुछ्  जाति को बढाते  हैं ,कुछ को घटाते हैं ,वैसे  ही  ईश्वर भी खेल करता रेह्ता है. ईश्वर विचारवान के  लिये  स्पष्ट रूप  से विश्व  का संचालक  है,अंतर्यामी है और स्वामी  है .उसी के   आश्रय में प्राणी मात्र का निवास है,वही सबको धारण करता है.जो ऐसे ईश्वर को नहीं मानते जानते हैं वे  अज्ञानी हैं ;उनकी बात पर कभी ध्यान  नही  देना चाहिये .ईश्वर आश्रय में ही जीव का परम कल्याण है.

ईश्वर है

ईश्वर परम सत्य है,पर्मार्थ वस्तु है. जो लोग केहते हैं  कि ईश्वर नहीं  है उनका  कहना युक्ति युक्त नहीं  है ; सर्वथा अनुभव  के विरुद्ध  है. आप ही विचार  कीजिये कि  जो  कहता है  कि  ईश्वर नहीं  है  क्या उसने  संसार का एक एक कण छान कर देख लिया ? क्या उसने काल  के एक एक क्षण की गणना करके उनकी सीमा जान ली ? क्या  उसने  देश  के कोण कोण की छान बीन करके जांच पडताल कर ली ? क्या उसने अपनी आत्मा और ह्रुद्य की गतिविधी को जांच  लिया ? यदि कहो  कि नही  तो  वह किस युक्ति के बल  पर कहता है  कि ईश्वर नहीं  है ?उसका कहना सर्वथा ही कपोल  कल्पना है. ईश्वर है  और  उसका साक्षात्कार  होता है.

ईश्वर ही साधन है

कोई कोई ईश्वर का भजन  तो करते हैं , लेकिन उससे  कोई दूसरी वस्तु  चाहते  हैं.ईश्वर और उसके  भजन को माध्यम बनाते है और पाना चहते हैं  दूसरी वस्तु को.यह निम्न  कोटि की कक्षा है.कोई कोई भजन तो करते हैं  पर उसके बल पर ईश्वर को पाना चाहते है.अर्थात  भजन  की कीमत  से ईश्वर को खरीदना चाहते हैं.उनकी मध्यम  कक्षा है ! जो ईश्वर  के आश्रय से ,ईश्वर के भरोसे पर ,ईश्वर के अनुग्रह से ईश्वर को पाना चाहते हैं उनकी कक्षा उत्तम है.असल में उपाय भी ईश्वर है, उपेय  भी ईश्वर है.जब  तक उपाय और उपेय मे अंतर रहता है तब तक ईश्वर प्राप्ति नहीं होती.उपाय और उपेय एक हो जाने पर भक्त और भगवान भी एक हो जाते हैं .

ईश्वर विश्वास

एक मनुश्य का ग्यान सीमित होता है , शक्ति  सीमित होती है और सद्भाव   सीमित होता है. परंतु इसी ज्ञान ,शक्ति   एवं सद्भाव की जो समष्टि  होती है वो अपरिमित  होती है. ईश्वर सब कुछ  जानता है -सर्वग्य है ;सब  कुछ करा सकता  है – सर्वश्क्ती मान  है ;सबका हित  करता है -द्यालु  है .ईश्वर  की सर्वग्यता  का अर्थ है कि वो हमारे ह्रुद्य  की जानता है ; सर्वशक्तिमानता का अर्थ  है  कि  वो सब कुछ कर सकता है ;दयालुता  का अर्थ  है  कि वो  दुख, मूर्खता और  म्रत्यु  के भय से हमको मुक्त  कर दे. ईश्वर यही करता है. इसलिये ईश्वर पर विश्वास रखना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है .