अनवरत

मद्धम गति से बेहती नदी

चीर देती है पहाड का सीना        

उंचाई से गिरता झरना

पत्थर मे बना देता है

सरोवर मीठे पानी का

समन्दर की छोटी लेहरें

चट्टानों से टकरा टकरा कर

उन्हें रेत में बदल देती है

नन्ही कोपलें जो कल हवा से कांपती थीं

आज विशाल व्रक्ष है जंगल के

निर्जन धरती जो सिर्फ सूर्य के पीछे भागने पर बाध्य थी

आज मोक्क्ष प्राप्त कर ईश्वर बनने वालों को पालती है

हम बंधें हैं मन और शरीर के बंधन में

आशा निराशा रात दिन जीवन मरण

पर प्रक्रुति इस चक्र के परे है

गलत है जो  केहता है कि प्रक्रुती निष्ठुर है

वो तो  धैर्यवान ,निष्पक्ष , निर्लिप्त , अडिग है

स्व्धर्म रत है, अनवरत है

~ By aahang

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दोस्ती की वजह कोई नहीं

ज़ुबां खामोशी की

तस्सवुर तुम्हारा                                                

बातें झरना मीठे पानी का

और खयाल फिसलती रेत से

कुछ ज़ाहिर, कुछ ज़ेहेन में बसे

एक रूहानी शाम , तुम्हारा साथ

वक़्त के दरियाओं के पार

कांधा तुम्हारा , दुख सुख हमारे

अश्क़ रुके हैं

पलकों के तले, अनबहे

उलझी हुई उंगलियां

हाथों में हाथ

दोस्ती की कोई वजह नहीं

ये तो है  जन्मों का साथ……..

~ ये कविता मेरे प्रिय मित्र श्री रवि शरन जी ने मेरे ब्लाग के लिये रची है. मैं इस भेंट के लिये उनका बहुत आभारी हूं .

झील


सुबह सुबह जल्दी आंख खुल गयी

सोचा चलो थोडा घूम कर आते हैं

दिसम्बर का महीना  था और

हवा की  ठंड धूप की गर्मी से झगड रही थी

रेस्ट हाउस के पीछे से एक पगडंडी जाती थी

नीचे के तरफ

सोचा चलो चलें सैर हो जायेगी और

अगर किस्मत नें साथ दिया तो

शायद कुछ नया देखने को मिल जाये

कूदते फांदते गिरते संभलते बचते बचाते

करीब पंद्र्ह मिनट में मैं नीचे पहुंच गया

जो देखा वो अदभुत तो नहीं था पर

अनंत सुखदायक था

सालों बाद आज शहर के बीचों बीच

एक नीली झील दिखी थी

पानी इतना साफ जैसे किसी

बच्चे का मन

फैलाव ऐसा कि जैसे आकाश को चुनौती देता हो

वतावरण इतना पावन

जैसे किसी मंदिर के आंगन में खडे हों

कुछ देर मैं यूं ही चुपचाप खडा रहा

समझ नहीं पा रहा था कि आभार किसका मानूं

पुरुष का या कि  प्रक्रुती का



**सभी चित्र मेरे NOKIA Music Express मोबाइल फोन से 

तू मेरे घर का दीपक है…

ये कविता मेरी मां ने मेरे लिये लिखी थी जब मैं कोई 1-2 बरस क था. आज पुराने कागज़ों मे मिली तो अपने ब्लाग पर प्रस्तुत करने का लालच छोड नहीं पाया. अड्तीस का सही पर हूं तो बच्चा ही….और किसी के लिये ना सही पर अपनी मां के लिये तो ज़रूर !

तू मेरे घर का दीपक है

तू मेरी आखों का तारा

तुझ से ही जीवन ज्योतित हैImage198

तुझ से ही घर उजियारा

तेरी पदलय की गति से

गतिमय आशाएं हैं

तेरे गुन गुन बोलों से

गुंजित सभी दिशाएं हैं

मेरे आंगन का नन्हा फूल

महकाएगा कल जग सारा

तू मेरे घर का दीपक है

तू मेरी आंखों का तारा ……

तू सत्कर्मों का फल है

तू मरूभूमि में जल है

अपनी मां क है तू संबल

जीने का एक सहारा

मेरे आंचल का मोती

नक्षत्र बने अंबर का

तेरी जगमग से बेटा

चमके धरती और नभ सारा

तू मेरे घर का दीपक है

तू मेरी आंखों का तारा ……

मै तो कुछ खास कर नहीं पाया सो ये कविता चरितार्थ न हो सकी.

अब सारी उम्मीदें अनंत जी से हैं ….. देखें वो अपनी दादी की बात को सच करते हैं या नहीं.