तू मेरे घर का दीपक है…

ये कविता मेरी मां ने मेरे लिये लिखी थी जब मैं कोई 1-2 बरस क था. आज पुराने कागज़ों मे मिली तो अपने ब्लाग पर प्रस्तुत करने का लालच छोड नहीं पाया. अड्तीस का सही पर हूं तो बच्चा ही….और किसी के लिये ना सही पर अपनी मां के लिये तो ज़रूर !

तू मेरे घर का दीपक है

तू मेरी आखों का तारा

तुझ से ही जीवन ज्योतित हैImage198

तुझ से ही घर उजियारा

तेरी पदलय की गति से

गतिमय आशाएं हैं

तेरे गुन गुन बोलों से

गुंजित सभी दिशाएं हैं

मेरे आंगन का नन्हा फूल

महकाएगा कल जग सारा

तू मेरे घर का दीपक है

तू मेरी आंखों का तारा ……

तू सत्कर्मों का फल है

तू मरूभूमि में जल है

अपनी मां क है तू संबल

जीने का एक सहारा

मेरे आंचल का मोती

नक्षत्र बने अंबर का

तेरी जगमग से बेटा

चमके धरती और नभ सारा

तू मेरे घर का दीपक है

तू मेरी आंखों का तारा ……

मै तो कुछ खास कर नहीं पाया सो ये कविता चरितार्थ न हो सकी.

अब सारी उम्मीदें अनंत जी से हैं ….. देखें वो अपनी दादी की बात को सच करते हैं या नहीं.