ना जाने क्यों…

ना जाने क्यों हम

घने काले बादलों के पीछे

देख नहीं पाते छुपे इंद्रधनुष को

ना जाने क्यों

शहर के शोर के बीच

सुन नहीं पाते पक्षियों का कलरव

ना जाने क्यो

संसार के दुख सुख में

मह्सूस नहीं कर पाते अपना अस्तित्व

और ना जाने क्यो

कुछ संजीदा करने के भ्रम में

खेल नहीं पाते खेल बच्चों का

ना जाने क्यों हम

मानते है म्रत्यु को एक सुदूर सम्भावना

और जीवन को बंधन नियती का

जबकि  म्रत्यु को पाना तो हमारी नियति है

और जीवन भरा हुआ है अनेक सम्भावनाओं से….

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मधुशाला के कुछ ठिकाने

छोटे से जीवन  में कितना                                                        

प्यार करूं , पी लूं हाला ,

आने के ही साथ जगत  में

कहलाया  “जानेवाला”

स्वागत के ही साथ विदा की

होती देखी तैयारी,

बंद लगी होने खुलते ही

मेरी जीवन मधुशाला ….

कितनी जल्दी रंग  बदलती

है अपना चंचल  हाला ,

कितनी जल्दी घिसने लगता

हाथों मे आकर प्याला ,

कितनी जल्दी साकी का

आकर्षण घटने लगता है ;

प्रात नहीं  थी वैसी, जैसी

रात लगी थी मधुशाला  ……

नही चाहता ,आगे बढ्कर

छीनूं  औरों का प्याला,

नहीं चाहता , ध्क्के  देकर

छीनूं औरों की   हाला ,

साकी ,मेरी ओर  न देखो ,

मुझको  तनिक मलाल  नहीं ;

इतना ही क्या कम आखों  से

देख रहा हूं   मधुशाला ……

उस प्याले  से प्यार  मुझे जो,

दूर  हथेली से प्याला ,

उस  हाला  का चाव मुझे  जो

दूर  अधर मुख  से  हाला  ;

प्यार  नहीं पा जाने में है  ,

पाने के अरमानों  में ,

पा जाता  तो  हाय  ना इतनी,

प्यारी लगती  मधुशाला  …..

प्राप्य  नहीं है तो, हो जाती

लुप्त  नहीं  फिर  क्यूं  हाला ,

प्राप्य नही  है  तो, हो जाता

लुप्त  नहीं  फिर  क्यूं  प्याला ;

दूर ना इतनी हिम्मत  हारूं  ,

पास ना इतनी  पा जाऊं,

व्यर्थ मुझे दौडाती  मरू में  ,

म्रुगजल  बन कर मधुशाला  ……

– हरिवंशराय ” बच्चन “

पथिक का प्रेम गीत…

मेरे आने पर देखो कैसे तुम्हारी आखें चमक गयीं

लगता है जाने पर मेरे सबसे ज़्यादा तुम रोओगे

मुझको बाहर तक पहुंचाने सब ही आए तुम ना आए

लगता है तन्हाई मे मेरी मेरे  साथ  तुम्ही  होओगे

मेरा गीत सुना  सब जागे  तुमको  कैसे नींद आ गयी

लगता है अब इंतज़ार में सारी रात नहीं सोओगे

सबने मुझसे  पूछे किस्से और तुम थे चुपचाप खडे

लगता है मन की मेहफिल का अंतिम गीत तुम्ही होओगे

रामअवतार त्यागी जी रचना  ‘ सबसे ज़्यादा तुम रोओगे ‘ के भावों को मैंने अपने स्तर से प्रस्तुत करनी की कोशिश की है. आशा है आप तक पहुंचेगी …… आहंग