अनवरत

मद्धम गति से बेहती नदी

चीर देती है पहाड का सीना        

उंचाई से गिरता झरना

पत्थर मे बना देता है

सरोवर मीठे पानी का

समन्दर की छोटी लेहरें

चट्टानों से टकरा टकरा कर

उन्हें रेत में बदल देती है

नन्ही कोपलें जो कल हवा से कांपती थीं

आज विशाल व्रक्ष है जंगल के

निर्जन धरती जो सिर्फ सूर्य के पीछे भागने पर बाध्य थी

आज मोक्क्ष प्राप्त कर ईश्वर बनने वालों को पालती है

हम बंधें हैं मन और शरीर के बंधन में

आशा निराशा रात दिन जीवन मरण

पर प्रक्रुति इस चक्र के परे है

गलत है जो  केहता है कि प्रक्रुती निष्ठुर है

वो तो  धैर्यवान ,निष्पक्ष , निर्लिप्त , अडिग है

स्व्धर्म रत है, अनवरत है

~ By aahang

Advertisements

दोस्ती की वजह कोई नहीं

ज़ुबां खामोशी की

तस्सवुर तुम्हारा                                                

बातें झरना मीठे पानी का

और खयाल फिसलती रेत से

कुछ ज़ाहिर, कुछ ज़ेहेन में बसे

एक रूहानी शाम , तुम्हारा साथ

वक़्त के दरियाओं के पार

कांधा तुम्हारा , दुख सुख हमारे

अश्क़ रुके हैं

पलकों के तले, अनबहे

उलझी हुई उंगलियां

हाथों में हाथ

दोस्ती की कोई वजह नहीं

ये तो है  जन्मों का साथ……..

~ ये कविता मेरे प्रिय मित्र श्री रवि शरन जी ने मेरे ब्लाग के लिये रची है. मैं इस भेंट के लिये उनका बहुत आभारी हूं .