मौत से एक संवाद

कल रात

तारों से करता था जब बात

अचानक दर्द हुआ सीने में

सांसे बोझिल हुईं                                                   starlit sky

और पेशानी पर उभर आईं बूंदे पानी की

देखा तो सामने मौत खडी थी

बोली ‘ चलें ?’

कहां ? मैं अभी कहीं नहीं जाउंगा

क्यों ??

मुझे ये जगह अच्छी लगती है

तो मरने से डरते हो तुम भी

नहीं मैं बिल्कुल नहीं डरता

क्यों नहीं ? मौत ने पूछा

हद है.तुम जीने से डरती हो क्या ?मैंने कहा

नहीं

तो फिर ?

मृत्यु और जीवन तो बस अवस्थाएं हैं,

केवल  एक बोध

जीवन का ना होना मृत्यु है

और मृत्यु का ना होना जीवन

पर मनुष्यों तो मरनें से डरते हैं

और तुम तो मनुष्य हो

किसने कहा ? मैं तो खुद को देवता समझता हूं

तो मैं कौन ? मौत बोली

मुझे क्या पता ? शायद मनुष्य !

तुम पागल हो गये हो

पागल ? अच्छा ये बताओ

पागल होना बेहतर है या मरा होना

शायद पागल होना

और मेरे लिये तो तुम मर चुकी हो

तुम मरी हुई मौत हो और मैं तो बस पागल

तभी मौत की परछाई धूमिल होने लगी

मेरे मरने का वक़्त टल चुका था

बालकनी का दरवाज़ा बन्द कर

मैं कमरे में आया और  लेट गया

बहुत दूर से एक आवाज आती जान पडी

कोई कह रहा था ‘ ये क्या पागलपन है?’

मैं समझ गया कि मौत

भगवान के पास वापस पहुंच गयी

मैंनें  चादर तानी और सो गया

रचनाकार – आहंग