मधुशाला के कुछ ठिकाने

छोटे से जीवन  में कितना                                                        

प्यार करूं , पी लूं हाला ,

आने के ही साथ जगत  में

कहलाया  “जानेवाला”

स्वागत के ही साथ विदा की

होती देखी तैयारी,

बंद लगी होने खुलते ही

मेरी जीवन मधुशाला ….

कितनी जल्दी रंग  बदलती

है अपना चंचल  हाला ,

कितनी जल्दी घिसने लगता

हाथों मे आकर प्याला ,

कितनी जल्दी साकी का

आकर्षण घटने लगता है ;

प्रात नहीं  थी वैसी, जैसी

रात लगी थी मधुशाला  ……

नही चाहता ,आगे बढ्कर

छीनूं  औरों का प्याला,

नहीं चाहता , ध्क्के  देकर

छीनूं औरों की   हाला ,

साकी ,मेरी ओर  न देखो ,

मुझको  तनिक मलाल  नहीं ;

इतना ही क्या कम आखों  से

देख रहा हूं   मधुशाला ……

उस प्याले  से प्यार  मुझे जो,

दूर  हथेली से प्याला ,

उस  हाला  का चाव मुझे  जो

दूर  अधर मुख  से  हाला  ;

प्यार  नहीं पा जाने में है  ,

पाने के अरमानों  में ,

पा जाता  तो  हाय  ना इतनी,

प्यारी लगती  मधुशाला  …..

प्राप्य  नहीं है तो, हो जाती

लुप्त  नहीं  फिर  क्यूं  हाला ,

प्राप्य नही  है  तो, हो जाता

लुप्त  नहीं  फिर  क्यूं  प्याला ;

दूर ना इतनी हिम्मत  हारूं  ,

पास ना इतनी  पा जाऊं,

व्यर्थ मुझे दौडाती  मरू में  ,

म्रुगजल  बन कर मधुशाला  ……

– हरिवंशराय ” बच्चन “

जो बीत गई सो बात गई

starlit-sky

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अंबर के आंगन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गये फ़िर कहां मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई


जीवन में वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुबन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियां
मुरझाईं कितनी वल्लरियां
जो मुरझाईं फ़िर कहां खिली
पर बोलो सूखे फ़ूलों पर
कब मधुबन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई


जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आंगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई


मृदु मिट्टी के बने हुए हैं
मधु घट फ़ूटा ही करते हैं
लघु जीवन ले कर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फ़िर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई

को‌ई गाता मैं सो जाता

mother-and-childसंस्रिति के विस्त्रित सागर मे
सपनो कि नौका के अंदर
दुख सुख कि लहरों मे उठ गिर
बहता जाता, मैं सो जाता ।


आँखों मे भरकर प्यार अमर
आशीष हथेली मे भरकर
को‌ई मेरा सिर गोदी मे रख
सहलाता, मैं सो जाता ।


मेरे जीवन का खाराजल
मेरे जीवन का हालाहल
को‌ई अपने स्वर मे मधुमय कर
बरसाता मैं सो जाता ।

को‌ई गाता मैं सो जाता

मैं सो जाता

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

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यह चाँद उदित होकर नभ में कुछ ताप मिटाता जीवन का,
लहरालहरा यह शाखा‌एँ कुछ शोक भुला देती मन का,
कल मुर्झानेवाली कलियाँ हँसकर कहती हैं मगन रहो,

बुलबुल तरु की फुनगी पर से संदेश सुनाती यौवन का,
तुम देकर मदिरा के प्याले मेरा मन बहला देती हो,
उस पार मुझे बहलाने का उपचार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

प्याला है पर पी पा‌एँगे, है ज्ञात नहीं इतना हमको,
इस पार नियति ने भेजा है, असमर्थबना कितना हमको,
कहने वाले, पर कहते है, हम कर्मों में स्वाधीन सदा,
करने वालों की परवशता है ज्ञात किसे, जितनी हमको?
कह तो सकते हैं, कहकर ही कुछ दिल हलका कर लेते हैं,
उस पार अभागे मानव का अधिकार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!


दृग देख जहाँ तक पाते हैं, तम का सागर लहराता है,
फिर भी उस पार खड़ा को‌ई हम सब को खींच बुलाता है!
मैं आज चला तुम आ‌ओगी, कल, परसों, सब संगीसाथी,
दुनिया रोतीधोती रहती, जिसको जाना है, जाता है।
मेरा तो होता मन डगडग मग, तट पर ही के हलकोरों से!
जब मैं एकाकी पहुँचूँगा, मँझधार न जाने क्या होगा!

दृग – Eyes ,तम – Darkness,एकाकी – alone

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

http://in.youtube.com/watch?v=ChM_-LVWgBU&feature=related

Madhushala

Apne yug mein sabko anupam gyaat hui apni haala,

Apne Yug mein sabko adbhut gyaat hua apna pyaala,

Phir bhi vridhon se jab poocha ek yehi uttar paya,

ab na rahe woh peenewale ab na rahi woh Madhushala.

Kitini Jaldi rang badalti hai apna chanchal haala,

Kitni Jaldi Ghisne Lagta haathon mein aakar pyaala,

Kitni Jaldi saki ka aakarshan ghatne lagta hai,

Praat nahin thi vaisi jaisi raat lagi thi madhushala.

Uss pyaale se pyaar mujhe jo dur hatheli se pyaala,

Uss haala ka chaav mujhe jo dur adhar mukh se haala,

Pyaar nahin pa jaane mein hai,Paane ke armanon mein,

Pa jaata tab haay na itni pyaari lagti madhushala.

Beautiful lines from one of my favourite poets Dr Bachchan.What I love about these lines is that they represent the true nature of our mindplay.We exist at multiple levels and the surprise is we ourselves do not know how many.This nature exibits itself very early when you are a child.As soon as you get the cycle it ceases to fire your imagination anymore.In fact you do not even wish to look at it after a couple of months.But sadly fail to recognise this fleeting aspect of our feelings……Kitni jaldi saki ka aakarshan ghatne lagta hai.When you are young you woo a girl and it feels like heaven when you are actually able to be freindly with her.But as the relation ship gets stronger and more intimate you recognize that your desire is diminishing by the minute.Blaming it on your wrong judgement you compromise and start living as if a stranger in your own home and start chasing another rainbow.If only I was the CEO of a MNC ……..If only I was the wealthiest and most influential man …..if only my children would love me…….If only I would die a peaceful death ! And then you ask yourself :

Praapya nahin hai to ho jaati lupt nahin phir kyun haala,

Praapya nahin hain to ho jaata lupt nahin phir kyun pyaala,

Dur na itni himmat haaroon Paas na itni Pa jaoon,

Vyarth mujhe daudati maru main mrig jal bankar madhushala.

To Listen to the recital of Madhushala By Amitabh Bachchan Pls copy and paste below link on your browser.Press enter :

http://www.esnips.com/doc/01a8dac9-0dce-42cd-b5bc-2c72586f4daa/madhushala

http://in.youtube.com/watch?v=cr7kLxTPjG0&feature=related