बनियान

आज सुबह देखा

तो एक गठ्ठर पड़ा था 

कपड़ों का, बेड पर

शायद फोल्ड होने के लिए

रखा था 

दोपहर तक जब 

काम कुछ हल्का हो जाता है

घर में ..

कपड़ों में बनियानें थीं

मेरी और मेरे बेटे की

जो अब साइज़ में कुछ कुछ

बराबर हो चुकी हैं

ज़रा गौर किया तो देखता हूँ

की छोटी वाली चमक रही हैं

एकदम बढ़िया क़्वालिटी 

की दमक और 

किसी में कोई छेद भी नहीं है

बड़ी वाली बनियानें 

मटमैली सी थीं

पतले कपड़े की सस्ती वाली

अरे अंदर ही तो पहनना है 

वाली मिडिल क्लास मेन्टेलिटी

का ब्रांड झांकता हुआ गले पर

कुछ में छेद भी थे 

वो अभी इतने बड़े नहीं हुए थे 

कि सौ रुपया खर्च किया जाए

आखिर हवा भी तो आती है

ताज़ा ताज़ा ..

मैं कुछ देर मुस्कुराया

पर फिर सोचने लगा 

ये फर्क क्यों ?

मनन किया तो बात

आ गयी समझ में 

सरल बात थी पर 

गहरी भी 

 दरअसल बेटे की मां

 उसके लिए

लाती है बनियान 

और मैं 

खुद अपने लिए खरीदता हूँ

पापा भी तो यही करते थे

हमेशा 

– आहँग 

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तुम्हारे साथ रहकर

लेखक: सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है
कि दिशाएँ पास आ गयी हैं,
हर रास्ता छोटा हो गया है,
दुनिया सिमटकर
एक आँगन-सी बन गयी है
जो खचाखच भरा है,
कहीं भी एकान्त नहीं
न बाहर, न भीतर।
 हर चीज़ का आकार घट गया है,
पेड़ इतने छोटे हो गये हैं
कि मैं उनके शीश पर हाथ रख
आशीष दे सकता हूँ,
आकाश छाती से टकराता है,
मैं जब चाहूँ बादलों में मुँह छिपा सकता हूँ।
 तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे महसूस हुआ है
कि हर बात का एक मतलब होता है,
यहाँ तक की घास के हिलने का भी,
हवा का खिड़की से आने का,
और धूप का दीवार पर
चढ़कर चले जाने का।
 तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
सम्भावनाओं से घिरे हैं,
हर दिवार में द्वार बन सकता है
और हर द्वार से पूरा का पूरा
पहाड़ गुज़र सकता है।
 शक्ति अगर सीमित है
तो हर चीज़ अशक्त भी है,
भुजाएँ अगर छोटी हैं,
तो सागर भी सिमटा हुआ है,
सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है,
जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है
वह नियति की नहीं मेरी है।