न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता

डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता

हुआ जब ग़म से यूँ बेहिस तो ग़म क्या सर के कटने का

न होता गर जुदा तन से तो ज़ाँनों(thighs) पर धरा होता

हुई मुद्दत के “ग़ालिब” मर गया पर याद आता है

वो हर एक बात पे कहना के यूँ होता तो क्या होता

नींद क्यों रात भर नहीं आती

ghalibकोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

मौत का एक दिन मु’अय्याँ है
नींद क्यों रात भर नहीं आती

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती

है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती

क्यों न चीख़ूँ कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं आती

हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती

काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’
शर्म तुमको मगर नहीं आती