Selected Poems – Gulzar

Gulzar won an Oscar today along with AR Rehman.To be fair to myself this is not a review but  just a tribute to the great poet we have all loved for half a century now.

The book is called Selected Poems – Gulzar and it is published by penguin under Penguin Poetry collection.Some great mindscapes and some very profound thoughts wrapped up beautifully in an impeccable  bouquet of words.

A must read for all lovers of Urdu and Hindi poetry.

Little interesting facts :                                                            selected-poems

1.Gulzar is the pen name of Sampooran singh Kalra

2.Gulzar is married to film actress Raakhi

3.His first hindi movie was Bimla Rpys Bandini

4.One of his most famous songs “Dil Dhoondhta hai Phir wohi” takes its opening line from a Ghazal by Mirza Ghalib.

दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन

बैठे रहें तस्सवुर ए जाना किए हुए ……..

You can read some of his works on my blog by searching for tag Gulzar or byjust going to the poetry section.You will know which ones are his..won’t you ?

I imagine you,Silently

rain1

बन्द  शीशों के परे देख,दरीचों के उधर

सब्ज़ पेड़ॉं पे,घनी शाखों पे,फूलों पे वहां

कैसे चुपचाप बरसता है मुसलसल पानी

कितनी आवाज़ें हैं,ये लोग हैं, बातें हैं मगर

ज़ेहेन के पीछे किसी और ही सतह पे कहीं

जैसे चुपचाप बरसता है तस्सवुर तेरा

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Look beyond the closed panes,beyond the acloves

On the green trees,the branches and on the flowers

How silently it rains,ceaselessly

In the midst of all the noise,the people and so many voices

In the depth of my thoughts,at another level somewhere

I imagine you,Silently.

~author Gulzar

~interpretative translation by aahang

हार

कभी कभी बाजा़र में यूँ भी हो जाता है
क़ीमत ठीक थी,जेब में इतने दाम नहीं थे

ऐसे ही इक बार मैं तुम को हार आया था।

जैसे एहसान उतारता है कोई

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई          mirror1
जैसे एहसान उतारता है कोई

आईना देख के तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई

देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई

नज़्म उलझी हुई है सीने में

नज़्म उलझी हुई है सीने में            pen
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी

मुझको भी तरकीब सिखा मेरे यार जुलाहे

मुझको भी तरकीब सिखा मेरे यार जुलाहे

अकसर तुझको देखा है कि ताना बुनते carpet-weaver

जब कोई तागा टूट गया या खत्म हुआ

फिर से बांध के

और सिरा कोई जोड़ के उसमे

आगे बुनने लगते हो

तेरे इस ताने में लेकिन

इक भी गांठ गिरह बुन्तर की

देख नहीं सकता कोई

मैनें तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता

लेकिन उसकी सारी गिराहें

साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे