बनियान

आज सुबह देखा

तो एक गठ्ठर पड़ा था 

कपड़ों का, बेड पर

शायद फोल्ड होने के लिए

रखा था 

दोपहर तक जब 

काम कुछ हल्का हो जाता है

घर में ..

कपड़ों में बनियानें थीं

मेरी और मेरे बेटे की

जो अब साइज़ में कुछ कुछ

बराबर हो चुकी हैं

ज़रा गौर किया तो देखता हूँ

की छोटी वाली चमक रही हैं

एकदम बढ़िया क़्वालिटी 

की दमक और 

किसी में कोई छेद भी नहीं है

बड़ी वाली बनियानें 

मटमैली सी थीं

पतले कपड़े की सस्ती वाली

अरे अंदर ही तो पहनना है 

वाली मिडिल क्लास मेन्टेलिटी

का ब्रांड झांकता हुआ गले पर

कुछ में छेद भी थे 

वो अभी इतने बड़े नहीं हुए थे 

कि सौ रुपया खर्च किया जाए

आखिर हवा भी तो आती है

ताज़ा ताज़ा ..

मैं कुछ देर मुस्कुराया

पर फिर सोचने लगा 

ये फर्क क्यों ?

मनन किया तो बात

आ गयी समझ में 

सरल बात थी पर 

गहरी भी 

 दरअसल बेटे की मां

 उसके लिए

लाती है बनियान 

और मैं 

खुद अपने लिए खरीदता हूँ

पापा भी तो यही करते थे

हमेशा 

– आहँग 

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शाश्वत के संदर्भ में…

एक रोज़

मुझे साफ साफ याद है

शाम थी, दूर का सफर था

और मै चाय के लिये

उतर गया था एक गांव के पास

एक बूढा किसान

पास के खेत में बैठा

ना जाने शितिज के पार

क्या देख रहा  था

उसके चेहरे पर कोई

भाव नहीं था और ना थे

उसके मन मे दुख सुख

लोभ,मोह,चिंता …….

कहने को तो उसके पास

कोई काम नहीं था

पर  वो इस तरह

अनंत को ताड रहा था

जैसे ये भी कोई काम हो

मेरी चाय खत्म हो गयी

और मैं  चलने लगा

तो हमारे नज़रें मिलीं

और वो मुस्कुरा दिया

जैसे कह रहा हो कि

वो वक़्त को बिता रहा था

जैसे वो चाहता था

और वक़्त मुझ पर बीत रहा था

जैसे वक़्त की मर्ज़ी थी

कर्म मे बंधन है

क्योंकि अच्छा हो या बुरा

कर्म अहं को आग देता है

वक़्त को जीत लिया था

उस बूढे सम्राट ने

जो अब घर जा रहा था कि

कल फिर नये उत्साह, नयी उमंग से

दिन भर  कुछ भी ना करे

बस घूरता  रहे  वक्त को

अनंत काल तक….

‍‍~ आहंग

यात्रा…

जो जीता हूँ
वो सुनता हूँ
जो सुनता हूँ
वो गुनता हूँ
जो गुनता हूँ
वो बुनता हूँ
जो बुनता हूँ
वो लिखता हूँ
 जो लिखता हूँ
  वो जीता हूँ…..

~ आहंग

जब तेरी समन्दर आँखों में

 

 

ये धूप किनारा शाम ढले
मिलते हैं दोंनो वक्त जहाँ

जो रात न दिन, जो आज न कल
पल भर में अमर, पल भर में धुंआँ

इस धूप किनारे, पल दो पल
होठों की लपक, बाँहों की खनक
ये मेल हमारा झूठ न सच
क्यों रार करें, क्यों दोष धरें
किस कारण झूठी बात करें

जब तेरी समन्दर आँखों में
इस शाम का सूरज डूबेगा
सुख सोयेंगे घर-दर वाले
और राही अपनी राह लेगा …..

~ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फासले…..

तब मैं तुम्हे जानना चाहता था

और तुम मुझे समझ नहीं पाती थीं

अब तुम मुझे जानना नहीं चाहती

और मै तुम्हें समझ नही सकता

दर्मियां अपने , दूरियां तो कम हैं शायद

हां फासले बहुत हैं…..

–  आहंग

 

 

अपना ही इंतेज़ार किया है मैनें कई शाम …

खुदाया ये बेखुदी कि खुद के साथ बैठ कर

अपना ही इंतेज़ार किया है मैनें कई शाम …

तमाम चेहरों में कौन सा चेहरा है मेरे दोस्त

है खुद से ये सवाल किया मैनें कई शाम…

इस आग के दरिया की मैं भी तो लहर  हूं

सोचा है साहिल पर खडे  रहके मैनें कई  शाम…

ये कैसी कशमकश है ये कैसा जुनूं है

समझा तो नहीं पर सोचा है यही मैनें कई शाम..

एक चांद को तारों से करते बात देखकर

ढूंढा है अपना भी आसमान कई शाम …..

– आहंग

जो मैंने जाना है ……

इस मोड से जाते हैं        

कुछ  सुस्त कदम रस्ते

कुछ तेज़  कदम राहें

इन  तेज़ सी राहों  पर

हम दौड्ते रेह्ते हैं

और जान नहीं पाते

क्या हमने खोया है

कभी  सुस्त  से रस्तों पर

मेरे साथ चलो तुम भी

और देखो वो सब कुछ

जो मैंने  जाना  है  ……

‍‍~  आहंग