Majaz Poetry from Kahkashan

Advertisements

क्या समझती हो कि तुमको भी भुला सकता हूँ मैं

अपने दिल को दोनों आलम से उठा सकता हूँ मैं
क्या समझती हो कि तुमको भी भुला सकता हूँ मैं             couple-on-the-beach

You think I can’t let go of both worlds,I can

You think I can’t forget you ,I can

कौन तुमसे छीन सकता है मुझे क्या वहम है
खुद जुलेखा से भी तो दामन बचा सकता हूँ मैं

It’s your misgiving that you can lose me to her

I can myself be indifferent to that beauty,I can.

दिल मैं तुम पैदा करो पहले मेरी सी जुर्रतें
और फिर देखो कि तुमको क्या बना सकता हूँ मैं

Sow in yourself the same audacity I have

and I will make you someone else ,I can.

दफ़न कर सकता हूँ सीने में तुम्हारे राज़ को
और तुम चाहो तो अफसाना बना सकता हूँ मैं

I can bury your deepest secrets If I will

and I can make them a legend if you want,I can.

तुम समझती हो कि हैं परदे बहुत से दरमियाँ
मैं यह कहता हूँ कि हर पर्दा उठा सकता हूँ मैं

You think that there are lots of curtains that hide

I say I will lift each one of them if I wish,I can.

तुम कि बन सकती हो हर महफ़िल मैं फिरदौस-ए-नज़र
मुझ को यह दावा कि हर महफ़िल पे छा सकता हूँ मैं

Yes you may be the heavenly gaze in any gathering

But I challenge that I can be the life of any party,I can.

आओ मिल कर इन्किलाब ताज़ा पैदा करें
दहर पर इस तरह छा जाएं कि सब देखा करें

Let’s get together and start a a revolution afresh,

and be such that everyone looks at us and says Wow!

~ Majaz Lucknowi

~ interpretative translation By aahang

A million times ….

Says Majaz Lucknowi :

Humdum Yahi Hai, Rah-Guzaar-E-Yaar-Khush Khiraam
Guzre Hain Laakh Baar Isi Kahkashaan Se Hum

हमदम यही है ,राह- गुज़र – ए – यार खुश खिराम

गुज़रे हैं लाख बार इसी केह्कशां से हम

This slow pace,this path of bliss has been my companion

I have passed this galaxy a million times…

Says Marcus Aurelius  ;

Even if you are going to live three thousand more years,or ten times that,remember :you cannot loose another life than the one you’re living now,or live another one that you’re losing.

The longer amounts to the same as the shortest.

The present is the same for everyone;its loss is the same for everyone;and it should be clear that a brief instant is all that is lost.For you can’t lose either the past or the future,how could you lose what you don’t have ?

Remember two things :

1. that everything has always been the same,and keeps recurring,and it makes no difference whether you see the same things recur in a hundred years or two hundred,or in an infinite period;

2.that the longest lived and those who will die the soonest lose the same thing.The present is all that they can give up,since that is all they have and what you do not have you cannot loose.

अब तुम मेरी पास आई हो तो क्या आई हो

girl-on-terrace

अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो?

मैने माना के तुम इक पैकर-ए-रानाई हो
चमन-ए-दहर में रूह-ए-चमन आराई हो
तलत-ए-मेहर हो फ़िरदौस की बरनाई हो
बिन्त-ए-महताब हो गर्दूं से उतर आई हो

मुझसे मिलने में अब अंदेशा-ए-रुसवाई है
मैने खुद अपने किये की ये सज़ा पाई है

पैकर-ए-रानाई : paradigm of beauty; चमन-ए-दहर : garden of earth; रूह-ए-चमन आराई : soul of beautified garden; तलत-ए-मेहर : Prayer of Sun; फ़िरदौस की बरनाई : paradise’s youthfulness; बिन्त-ए-महताब : daughter of moon; गर्दूं : heavens; अंदेशा-ए-रुसवाई : possibility of humiliation

ख़ाक में आह मिलाई है जवानी मैने
शोलाज़ारों में जलाई है जवानी मैने
शहर-ए-ख़ूबां में गंवाई है जवानी मैने
ख़्वाबगाहों में गंवाई है जवानी मैने

हुस्न ने जब भी इनायत की नज़र ड़ाली है
मेरे पैमान-ए-मोहब्बत ने सिपर ड़ाली है

शोलाज़ारों – flaming lamentations शहर-ए-ख़ूबां – city of beauty ख़्वाबगाहों – bedrooms

उन दिनों मुझ पे क़यामत का जुनूं तारी था
सर पे सरशारी-ओ-इशरत का जुनूं तारी था
माहपारों से मोहब्बत का जुनूं तारी था
शहरयारों से रक़ाबत का जुनूं तारी था

एक बिस्तर-ए-मखमल-ओ-संजाब थी दुनिया मेरी
एक रंगीन-ओ-हसीं ख्वाब थी दुनिया मेरी

जुनूं – passion;सरशारी-ओ-इशरत : satisfaction and happiness; माहपारों: moon-faced; शहरयारों : friends of the city; रक़ाबत : animosity; एक बिस्तर-ए-मखमल-ओ-संजाब: bed of velvet and fur

क्या सुनोगी मेरी मजरूह जवानी की पुकार
मेरी फ़रियाद-ए-जिगरदोज़ मेरा नाला-ए-ज़ार
शिद्दत-ए-कर्ब में ड़ूबी हुई मेरी गुफ़्तार
मै के खुद अपने मज़ाक़-ए-तरब आगीं का शिकार

वो गुदाज़-ए-दिल-ए-मरहूम कहां से लाऊँ
अब मै वो जज़्बा-ए-मासूम कहां से लाऊँ

मजरूह : wounded;फ़रियाद-ए-जिगरदोज़- my heart’s lamentations; नाला-ए-ज़ार : song of tears; शिद्दत-ए-कर्ब : acute grief; गुफ़्तार – conversations; गुदाज़-ए-दिल-ए-मरहूम :tenderness of a heart which died

जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ

highway

शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ
ग़ैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

झिलमिलाते कुमकुमों की, राह में ज़ंजीर सी
रात के हाथों में, दिन की मोहिनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर, चलती हुई शमशीर सी
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल
आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

फिर वो टूटा एक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में, आई ये मोती की लड़ी
हूक सी सीने में उठी, चोट सी दिल पर पड़ी
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

रात हँस – हँस कर ये कहती है, कि मयखाने में चल
फिर किसी शहनाज़-ए-लालारुख के, काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर, ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

हर तरफ़ बिखरी हुई, रंगीनियाँ रानाइयाँ
हर क़दम पर इशरतें, लेती हुई अंगड़ाइयां
बढ़ रही हैं गोद फैलाये हुये रुस्वाइयाँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

रास्ते में रुक के दम लूँ, ये मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाये, ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

मुंतज़िर है एक, तूफ़ान-ए-बला मेरे लिये
अब भी जाने कितने, दरवाज़े है वहां मेरे लिये
पर मुसीबत है मेरा, अहद-ए-वफ़ा मेरे लिए
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

जी में आता है कि अब, अहद-ए-वफ़ा भी तोड़ दूँ
उनको पा सकता हूँ मैं ये, आसरा भी छोड़ दूँ
हाँ मुनासिब है ये, ज़ंजीर-ए-हवा भी तोड़ दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

एक महल की आड़ से, निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा, जैसे बनिये की किताब
जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

दिल में एक शोला भड़क उठा है, आख़िर क्या करूँ
मेरा पैमाना छलक उठा है, आख़िर क्या करूँ
ज़ख्म सीने का महक उठा है, आख़िर क्या करूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर, हैं नज़र के सामने
सैकड़ों चंगेज़-ओ-नादिर, हैं नज़र के सामने
सैकड़ों सुल्तान-ओ-ज़बर, हैं नज़र के सामने
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

ले के एक चंगेज़ के, हाथों से खंज़र तोड़ दूँ
ताज पर उसके दमकता, है जो पत्थर तोड़ दूँ
कोई तोड़े या न तोड़े, मैं ही बढ़कर तोड़ दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

बढ़ के इस इंदर-सभा का, साज़-ओ-सामाँ फूँक दूँ
इस का गुलशन फूँक दूँ, उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
तख्त-ए-सुल्ताँ क्या, मैं सारा क़स्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

जी में आता है, ये मुर्दा चाँद-तारे नोंच लूँ

इस किनारे नोंच लूँ, और उस किनारे नोंच लूँ

एक दो का ज़िक्र क्या, सारे के सारे नोंच लूँ

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

Link for You Tube :

http://in.youtube.com/watch?v=BMzTmp97F6E