तब देख बहारें होली की…..

जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की
और दफ के शोर खडकते हों,तब देख बहारें होली की

परियों के रंग दमकते हों, तब देख बहारें होली की
खम शीशे जाम छलकते हों ,तब देख बहारें होली की

महबूब नशे में छकते हों, तब देख बहारें होली की
सीनों से रंग ढलकते हों ,तब देख बहारें होली की

दिल में अहसास महकते हो, तब देख बहारे होली की
पकवान बहुत से पकते हों ,तब देख बहारें होली की…..

होली मुबारक !! खूब मज़े कीजिये…..

The beautiful composition above is from Nazeer Akbarabadi and the last 2 lines have been added by yours truly as my contribution to the spirit of holi.

अब तो पथ यही है

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,

अब तो पथ यही है

अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,

एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,

यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,

क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,

अब तो पथ यही है |

क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,

एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,

एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए,

आज हर नक्षत्र है अनुदार,

अब तो पथ यही है|

यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,

यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,

यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,

कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,

अब तो पथ यही है |

Life has accepted it
This will be my path now
The ferocity of rising tide has faded away,
The fog which was there somewhere is no more,
This stone may melt or may not, but at least its softened,
Why should I beg from the skies,
This must be my path now
This vase made of glass is but fragile,
leaving the ordinary story untold
the bond I had with light looks bleak
and the stars seem so small
But , this will be my path now
The fight, which I have fought with myself,
It’s suffocation, it’s pain, is heard in books only,
I have made the climb not with my feet
but with my conviction,
And these windows are poised to be my doors soon,
I know this is my path now
~ By Dushyant Kumar, interpretative translation by aahang

मेरे बेटे के नाम ..

सात समन्दर पार से                                                

दुनिया के बाज़ार से

जब मैं कल अपने घर आया

देरे रात थी सब सोये थे

तुमको भी सोता पाया

यूं तो हमेशा यूं होता है

मैं तुमको दुबका लेता हूं

पर उस पल ना जाने क्यों

लेट तुम्हारे पास लग यूं

कि मैं तुम में सिमट गया हूं

छोटे से सीने से लग कर

मेरी आंखें भीग गयीं

एक एक पल में ही जैसे

कितनी सदियां बीत गयीं

उठती गिरती सांसों का

एक अजब एहसास थे तुम

मैं ही तुम से दूर गया था

मेरे कितने पास थे तुम

वक़्त का चरखा डोलेगा

और निर्बल हो जाऊंगा मैं

पास तुम्हारे मेरे बेटे

खुद को पाने आऊंगा मैं

~ By Aahang

झील


सुबह सुबह जल्दी आंख खुल गयी

सोचा चलो थोडा घूम कर आते हैं

दिसम्बर का महीना  था और

हवा की  ठंड धूप की गर्मी से झगड रही थी

रेस्ट हाउस के पीछे से एक पगडंडी जाती थी

नीचे के तरफ

सोचा चलो चलें सैर हो जायेगी और

अगर किस्मत नें साथ दिया तो

शायद कुछ नया देखने को मिल जाये

कूदते फांदते गिरते संभलते बचते बचाते

करीब पंद्र्ह मिनट में मैं नीचे पहुंच गया

जो देखा वो अदभुत तो नहीं था पर

अनंत सुखदायक था

सालों बाद आज शहर के बीचों बीच

एक नीली झील दिखी थी

पानी इतना साफ जैसे किसी

बच्चे का मन

फैलाव ऐसा कि जैसे आकाश को चुनौती देता हो

वतावरण इतना पावन

जैसे किसी मंदिर के आंगन में खडे हों

कुछ देर मैं यूं ही चुपचाप खडा रहा

समझ नहीं पा रहा था कि आभार किसका मानूं

पुरुष का या कि  प्रक्रुती का



**सभी चित्र मेरे NOKIA Music Express मोबाइल फोन से 

At the end of the day

Image300

In restlessness they roar

the  waves strike ashore

Casting an ominous shroud

the sun sets  behind the cloud

It leaves without a word

the scene looks so  absurd

I won’t give up without a fight

though  I  dread another long night

Watching my twisted destiny

I am the lonely tree

Its getting dark ;  you are so far away

I am all alone ,  at  the end of  the day

तू मेरे घर का दीपक है…

ये कविता मेरी मां ने मेरे लिये लिखी थी जब मैं कोई 1-2 बरस क था. आज पुराने कागज़ों मे मिली तो अपने ब्लाग पर प्रस्तुत करने का लालच छोड नहीं पाया. अड्तीस का सही पर हूं तो बच्चा ही….और किसी के लिये ना सही पर अपनी मां के लिये तो ज़रूर !

तू मेरे घर का दीपक है

तू मेरी आखों का तारा

तुझ से ही जीवन ज्योतित हैImage198

तुझ से ही घर उजियारा

तेरी पदलय की गति से

गतिमय आशाएं हैं

तेरे गुन गुन बोलों से

गुंजित सभी दिशाएं हैं

मेरे आंगन का नन्हा फूल

महकाएगा कल जग सारा

तू मेरे घर का दीपक है

तू मेरी आंखों का तारा ……

तू सत्कर्मों का फल है

तू मरूभूमि में जल है

अपनी मां क है तू संबल

जीने का एक सहारा

मेरे आंचल का मोती

नक्षत्र बने अंबर का

तेरी जगमग से बेटा

चमके धरती और नभ सारा

तू मेरे घर का दीपक है

तू मेरी आंखों का तारा ……

मै तो कुछ खास कर नहीं पाया सो ये कविता चरितार्थ न हो सकी.

अब सारी उम्मीदें अनंत जी से हैं ….. देखें वो अपनी दादी की बात को सच करते हैं या नहीं.

Droplets on my window

The train moves

Swift and sometimes restrained

Hopeful , fast ,speeding                                          Image268

Sad and slow

as my thoughts

The scene outside changes

from parched landscape

seeking rain

To a green patch with paddy

There are large Junctions

crossing paths

and to break the monotony

Some smaller stops

They are all on my way

each with its own role to play

These droplets of rain

on my window

every  one a reminder

of a place or a person

The train gathers speed

approaching a new horizon

and  the drops fade one by one

with a force that breaks them away

What’s left of them

will be soaked in by the sun

And the promise of a new day

भागती जाती है रेल

कभी तेज़ कभी रुकी रुकी सी

जोश और उत्साह

निराशा और दुख

जैसे मेरा मन

द्र्श्य बदलता रहता है

सूखी धरती

आसमान ताकती है

फिर आ जाते हैं हरे भरे खेत

लहलहाते हुए

बडे  जं क्शन  आकर

राहें बदल देते हैं और

छोटे छोटे स्टेशन छूट कर

मिटाते देते हैं सफर की ऊब को

ये सब मेरे सफर का हिस्सा हैं

और सबका एक किरदार है

ये जो बूंदे हैं ना

मेरी खिड्की के शीशे पर

याद दिलाती हैं

किसी और वक़्त की

किसी और शख़्स की

तभी रेल बढा देती है रफ्तार

नये क्षितिज को पाने के लिये

ये वेग यादों को ठ्हरने नही देता और

एक एक कर बूंदें धूमिल होनें लगती हैं

जो शेष रह जायेगा इनका

वो  कल का सूरज सोख लेगा

रह जायेगी तो बस उम्मीद

एक नये दिन की

~ By Aahang

~ The picture was taken by me en route to Bhopal near Eastern Ghats