अजनबी (strangers)

तब ये समा था कि क्या मैं बात करूं तुमसे,

अब ये आलम है कि क्या मैं तुमसे करूं बात ?

I thought then that I should talk to you.But what ?

Now I think that what should I talk to you ? If at all…

~aahang

 

Advertisements

फासले…..

तब मैं तुम्हे जानना चाहता था

और तुम मुझे समझ नहीं पाती थीं

अब तुम मुझे जानना नहीं चाहती

और मै तुम्हें समझ नही सकता

दर्मियां अपने , दूरियां तो कम हैं शायद

हां फासले बहुत हैं…..

–  आहंग

 

 

I have no friends or enemies

कोई दोस्त है न रकीब है,
तेरा शहर कितना अजीब है.                               Hong Kong.php

यहाँ किसका चेहरा पढा करूं,
यहाँ कौन इतना करीब है.

मैं किसे कहूं मेरे साथ चल,
यहाँ सब के सर पे सलीब है

वह जो इश्क था वह जूनून था,
ये जो हिज्र है ये नसीब है.

तुझे देख कर मैं हूं सोचता ,तू हबीब है या रक़ीब है,

तेरा शहर कितना अजीब है

There are no friends or enemies

How strange is this city of yours

Whose face should I read now

I have no one who is close to me

Whom should I ask to come along

All of them have their own cross to bear

The affair that I once had was an obsession

This longing which I have now is my destiny

Looking at you, I can’t make up my mind

If you are really a friend or may be an enemy of mine

The Ghazal has always been very close to my heart but for some reason it has been the top of my mind these days.

At a point you do realize the relativity in relationships and the fact that the only thing  static,absolute and changeless about you is yourself.

मुझको भी तरकीब सिखा मेरे यार जुलाहे

मुझको भी तरकीब सिखा मेरे यार जुलाहे

अकसर तुझको देखा है कि ताना बुनते carpet-weaver

जब कोई तागा टूट गया या खत्म हुआ

फिर से बांध के

और सिरा कोई जोड़ के उसमे

आगे बुनने लगते हो

तेरे इस ताने में लेकिन

इक भी गांठ गिरह बुन्तर की

देख नहीं सकता कोई

मैनें तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता

लेकिन उसकी सारी गिराहें

साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे